Monday, January 20, 2014

उपन्यास खारा पानी और कहानी संग्रह सवालों में जिंदगी


पत्र वाचन मधु आचार्य के हिंदी उपन्यास और कहानी संग्रह पर

कोई शब्द लिखे जाने से पहले जहां सांस ले रहा होता है, ठीक वहीं उससे संवाद का सिलसिला रचनाकार आरंभ करता है। किसी भी कार्य-व्यवहार में आगाज की भूमिका महत्त्वपूर्ण हुआ करती है। लेखन में किसी एक या दो-चार शब्द, या कहें शब्दों से नहीं वरन्‍ शब्दों के आगार किसी महासागर से प्रगाढ़ता अनिवार्य है। धरती पर होने वाली वर्षा का अपना सृजन है। सहज-सरल रचना में सतही सरलता-सहजता के आलोक में जटिलताएं भले प्रगट नहीं हुआ करें किंतु यह कार्य सहज नहीं होता। इसी दुनिया का यह तिलस्म है कि यहां शब्दों से केवल दोस्ती और पहचान से कोई गरज पूरी नहीं होती। किसी रचना के आगाज और अंजाम को लेकर अक्सर कई किस्म की कठिनाइयां, दुविधाएं, चिंतन का सिलसिला और धुंधलका भी हुआ करता है….आदि, मध्य और अंत के इस सरल से सफर में किसी रचना हेतु शब्द-चयन फिर विभिन्न शब्दों को पदों में व्यवस्थित करना, वाक्य-संधान के अनेकानेक अनुशासन और नए नए अनुच्छेदों का अनुसंधान-निर्माण करना सरल कार्य नहीं। मूर्त-अमूर्त चित्र बनाने या किसी सुर-साधना के समानंतर शब्दों की अर्थी-रचना और व्यंजना विधान में गहरे सरोकारों से जुड़े हैं मधु आचार्य ‘आशावादी’ । आपने नाटक, उपन्यास, कहानी और कविता विधाओं के अंतर्गत जो सृजन किया है और जो कर रहे हैं वह निश्चय ही बहुआयामी होने का साक्षी तो है ही साथ ही साथ कला माध्यमों से उनके गहरे सरोकारों को भी व्यंजित करता है। सृजन का सौंदर्य कला के स्तर पर कला और भाव पक्ष को समाहित करता है किंतु लोक चेतना और सामाजिक सरोकारों की बात हो तो भाव पक्ष की प्रधानता के पक्षधर मधु आचार्य के सृजन-लोक को रेखांकित किया जा सकता है।
कहानी और उपन्यास कहने को तो कथा-साहित्य के अंतर्गत समाहित होते हैं, किंतु इसके विन्यास-स्थापत्य में गहरा अंतर माना गया है। मेरी दुविधा, संदेह, विश्वास जहां इन दो विधाओं की कृतियों पर एक साथ अपनी बात रखने में है, वहीं “सवालों में जिंदगी’ कहानी संग्रह और “खारा जल” उपन्यास पर पत्र वाचन को लेकर भी है। मैं अपनी बात में किसी पत्र जैसी निजता और साथ ही इस वाचन के सार्वजनीकरण के द्वंद्व को भी प्रगट करना चाहता हूं। किसी भी कृति के पाठ के तुरंत बाद बहुत जल्दी में कोई टिप्पणी अवसर की मांग तो हो सकती है, किंतु उस कृति विशेष पर गहरे चिंतन-मनन के अधिकार का यह हनन भी है। इसी पशोपेश में यहां यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य है कि यह एक पाठकीय-टिप्पणी है। और जैसा कि आप जान ही चुके हैं कि मैं इसके आरंभ को लेकर किसी ऐसे मार्ग की तलाश में हूं जिस पर गुजरता हुआ आपका भी साथ पा सकूं। सच जानिए कि अगर सही आगाज हो जाएगा तो यात्रा आसान हो जाएगी। मैं यह आगाज इस विश्वास के साथ कर रहा हूं कि मूल कृतियों के पूर्ण पाठ हेतु आप प्रवृत होंगे और स्वयं अपने मार्ग को चुनते हुए अपने पाठ को अंजाम देंगे।
किसी रचना का पाठ अथवा पाठ को देखना-सुनना मर्म की अपेक्षा रखता है। निष्ठा और धैय के अभाव में किसी भी पाठ की दिशा विलोम हो सकती है। किसी रचना-पाठ में जितनी सीढ़ियां रचनाकार चढ़ता है, ठीक उतनी और उससे भी अधिक जांच-परख सतर्कता के साथ उसके पीछे-पीछे मुझ जैसे पाठकर्त्ता को चलना होता है। रचना में शब्द-शब्द से खुलते रहस्यों के बीच हर सीढ़ी को जांचना-परखना और पूर्व पद्चापों की ध्वनियों के अनुभव जगत में जाने की यह कोशिश असल में किसी रचना-पाठ की प्रविधि कही जा सकती है। अपने संदेहों और विश्वासों को एकसाथ संजोना-साधना जहां पाठ के आनंद को बाधित करता है वहीं स्वयं निर्मित रुचियों की अपेक्षा भी करता है। इस सब से सीधे मूल विषय पर आते हैं।
समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में “खारा पानी” उपन्यास की केंद्रीय कथा राजस्थान और पानी के इर्द-गिर्द बुनी होना अपने आप में इसकी बड़ी विशेषता है। यह कृति रेखांकित किए जाने योग्य कृतियों में इसलिए भी शामिल की जाएगी कि यह वर्तमान और भविष्य के सर्वाधिक चिंतनीय विषय पानी को केंद्र में रख कर रची गई है। पानी शब्द जेहन में आते ही रहीमजी का स्मरण हो आता है जिन्होंने बिन पानी सब सून कहा था। इस उपन्यास एक स्थान पर रहीमजी की इस उक्ति का रहिमन पानी राखिए उप-शीर्षक के रूप में प्रयुक्त होना एवं स्त्री चेतना के स्बर को साधना भी महत्त्वपूर्ण कहा जाएगा। राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त द्वारा जंग-ए-आजादी के समय लिखी गई कविता “अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी” आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उस दौर में हुआ करती थी। उपन्यास में लिखमा अबला से सबला बनती नजर आती है और वहीं संघर्ष की अनुपम ज्योति के रूप में ज्योतिर्मय होती है कि किसी प्रेरणा-पुंज के रूप में पाठक के अंतस में अंकित हो जाती है। अनुपम मिश्र जैसे रचनाकार अपने निबंध में राजस्थान के पानी को जहां “रजत बूंदों” की संज्ञा से गरिमा और गौरव प्रदान करते है, तो इसी रहीमजी-गुप्तजी की साहित्यिक परंपरा में एक स्मरणीय पानीदार रचना के रूप में “खारा पानी” जुड़ जाने को आतुर है। इस उपन्यास का केवल और केवल एक पाठ आप में हम में एक ऐसे अनुभव-लोक को अवतरित करता है कि वह मानस में चिरसंचित होने की स्वयं सिद्ध योग्यता रखात है।
खारा पानी के एक मार्मिक प्रसंग को यहां उद्घादटित करना समीचीन रहेगा। गांव में एक ठूंठ को लेकर जो रूढ धारणाएं है आरंभ में उनके विषय में उपन्यास में रोचक ढंग से खुलासा होता है तो वही ठूंठ अंत में उपन्यास की नायिका द्वारा जल-संघर्ष में शहीद हुए पिता के अंतिम कर्म के सामान के रूप में नवीन स्थापनों के साथ प्रयुक्त भी होता है। अस्तु कहा जा सकता है अपनी भाव-प्रवणता के कारण यह पाठ लंबे अंतराल तक स्मरणीय रहेगा। इस पाठ की विशेषता यह भी है कि इसे छोटे-छोटे अंश-दर-अंश बिभिन्न उप-शीर्षकों में सजाते हुए अंजाम तक ले जाया गया है। उपन्यासकार मधु आचार्य आशावादी के “खारा पानी” की नायिका लिखमा का स्मरण-सामर्थ्य दुख और पीड़ा को एकाकार करते हुए इसकी भाषिक संरचना की निश्चलता में समाहित है। वह धोरों की धरती के पश्चमी राजस्थान के भू-भाग में घटिल नग्न-यथार्थ रूप देखा-समझ और भोगा गया यथार्थ है। उपन्यास की पूरी कथा-वस्तु को मधु आचार्य जिस कौशल से शब्द-शब्द अंजाम देते हैं कि पाठक उन स्थलों-घटनाओं और परिवेश को स्वयं के भीतर उपजता या कहे पुनर्जन्म लेता हुआ महसूस करता है। लेखक की यह सार्थकता है कि वह इसकी कथा को केवल लिखता-कहता ही नहीं वरन् इसमें खुद डूब-सा जाता है और अपने पाठक को भी इस कथा-संसार में गहले ले जाकर स्नान कराने की सामर्थ्य रखता है। रेत से जुड़ी इस कहानी को पढ़ते हुए बार-बार जनकवि हरीश भादाणी की आवाज उनके सुधि-श्रोताओं के अंतस में जरूर उभरती है- रेत में न्हाया है मन। सारतः कहा जा सकता है कि “खारा जल” में भी प्रकारांतर से इसी प्रकार के रेत-असनान का आनंददायी सुखद अहसास कहीं इसके पाठ में समाहित है। यहां व्यंजित संपूर्ण संघर्ष का प्रतिफलन सुखद और प्रेरणादायी है। हम स्मरण करें कि जब निर्मल वर्मा “एक चिथड़ा सुख" जैसा उपन्यास लिखते हैं, तब उस पाठ में एक चिथड़ा दुख का भी कहीं जन्म समाहित होता है। सुख की तलाश में दुख को समझा जाए तो दुख दूर करने के कुछ रास्ते हमारे विकल्प के रूप में प्रस्तुत हो सकते हैं। मधु आचार्य के शब्दों में दुख तो है अहसास। इसी अहसास को भाषा में प्रगट करते हुए लेखक ने उस अहसास के ठीक उपर कलम की नोक रख दी और उसी से “खारा पानी” जैसा उपन्यास अपने पाठ के भीतर हा-हाकार करता नजर आता है। यहां आंखें भरी हुई होने के बाद भी कहीं किसी दृश्य में कोई धुंधलापन नहीं है। सब कुछ साफ और स्वच्छ है। उपन्यास नायिका का अपने दुख का अंत परंपराओं के नबीनीकरण में तलाश लेती है। शीर्षक “खारा पानी” है “खारा जल” नहीं है। खारा जल पद के साथ ही गुलशेर खान शानी के “कला जल” का स्मरण होता है। शानीजी का पाठ जिन आंखों से गुजरा है वे जानते हैं कि उसकी सार्थकता स्थानीय विशेष परिवेश को रचने में रही है। फणीश्वरनाथ रेणु और यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ जैसे उपन्यासकारो को भी प्रमाण स्वरूप याद किया जा सकता है कि जिनकी कलम ने जिस भाव-भूमि को अवतरित कर युग को संस्कारित किया वह साहित्य में विरल है।
सिद्धि व लक्ष्य के अभेदक कवच की निर्मूल भ्रांतियों को “खारा जल” उपन्यास अपनी सरलता-सहजता में तिरोहित करते हुए सहज साध्य की परिकल्पना प्रस्तुत करता है। इसके भाव-पक्ष के साथ ही शैल्पिक-विधान में प्रवेश के समय हमें लगता है कि इसका आवरण सरल और सहज है। असल में इस पाठ को ही मार्ग मान कर हम एक ऐसी यात्रा करते हैं कि जिसमें आप और हम अपने अंतस में पाते है कि एक चेतना का प्रस्फुरण मधु आचार्यजी ने किया है। असल में “खारा पानी” इस समर की महागाथा है। इस महागाथा के आस्वाद के बाद भीतर एक विश्वास जन्म लेता है। यहां निश्चय ही हम दुष्यंत कुमार को स्मरण कर सकते हैं- कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।
इस आस्वाद के बाद अंतराल अथवा विराम आना चाहिए था, किंतु आंशिक चर्चा कहानी-संग्रह की भी यहां अबसर के अनुकूल और अनिवार्य भी है। कहानी संग्रह के शीर्षक में प्रयुक्त जिंदगी शब्द की व्यापकता और विशालता तो निर्विवादित है, किंतु जिंदगी को सवालों में रखना-रहना समकालीनता का कटु यथार्थ है। हर जिंदगी के अपने सवाल-जबाब है। जाहिर है कि हम यह जानना चाहेंगे कि इस संग्रह में संकलित कहानियों में किस-किस किस्म की जिंदगियां है और उनके इर्द-गिर्द क्या-क्या सवाल हैं। समकालीन समय और समाज की अनेकानेक जटिलताएं हैं। रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकताओं को लांधला हुआ आदमी किन सबालों से जूझता है।
क्या बिना सवालों के कोई जिंदगी हो सकती… दूसरा पक्ष यह भी है कि जिंदगी सवालों में क्यों है? क्या आपको नहीं लगता कि पहले की तुलना में आज जिंदगी में सवालों की संख्या में अतिश्य वृद्धि हुई है। इन सवालों से मुक्त होने के उपाय क्या है? मुक्त हुआ भी जा सकता है अथवा नहीं? बिना सवाल के जीवन संभव है? ... ऐसे में संग्रह की 11 कहानियों का पाठ जिन चरित्रों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है वे हमारे आगे कुछ परिचित या कहें कम परिचित चरित्रों को प्रस्तुत करते हुए समाजिक यथार्थ को प्रस्तुत कर उन मुद्दों पर हमारी संवेदनाएं साझा करती है। ऐसे में कुछ चरित्र और घटनाएं बेहद मार्मिक रूप से कहानियों में प्रभावित करने वाली भी हैं। इससे इतर एक सवाल पर हम बात करेंगे- कि हर लेखक अलग अलग अवसरों पर जूझता है कि वह क्या और क्यों लिखें... पाठक क्या पढ़ना चाहते हैं... लेखन कोई पूर्वनिर्धारित उपक्रम है या भाषा के माध्यम से किसी सत्य को प्रस्तुत करने के साथ ही कुछ साधने-खोजना की कोई प्रविधि भी है। क्या लेखन के द्वारा केवल और केवल अपनी अंतर्निहित भावानाओं का ही पोषण होना चाहिए या फिर लेखन में जीबन के समानांतर इतिहास और समाजशास्त्र को पोषित किया जाना चाहिए। क्या किसी लेखक को उसके अंतस में जो धू-धू जलता झकझोरता सत्य है उसे छोड़ कर कहीं दूर निकल जाना चाहिए। मिथकों और बेमानी बिम्बों के जाल में बेशक जोखिम उठाने वाले बेहतर लेखक होते होंगे किंतु अपनी जमीनी सच्चाइयों का कच्चा-चिट्ठा सामने रखने वाले लेखक मधु आचार्य आशावादी का यह अवदान किसी भी स्तर पर कमतर नहीं है। उपभोक्तावाद और नवीन तकनीक को आज साहित्यिक विधाओं को ही नहीं संपूर्ण साहित्य को हासिये में धकेल रही हैं ऐसे में कथा-साहित्य के जरूरी आयुध मुद्रित-शब्द ही कथाकार का सहारा हैं कि वह इन चुनौतियों का डट कर मुकाबला करे।
इन कहानियों में रफीक भाई के नक्शे कदम पर जिंदगी की गाड़ी संभालते उनके पुत्र साबिर भाई से आपकी एक मुलाकान आपको हमेशा के लिए याद रहेगी। आदिवासी समाजिक सच को आप जान लेने के बाद विचारों की गुहाओं में जाकर सोचने पर विवश हो जाएंगे कि यह अब भी है। हमारी सारी प्रगति और तकनीकी विकास को खारिज करती मर्यादाएं, रूढ़ियां और परंपराएं सवच्छ समाज का सपना साकार होने में बाधक बनी हुई है। व्यक्ति के वैचारिक और वास्तविक उहापोह का ब्यौरा कहानी अहसासों में बदलाव और समय तू है गिरगिट में देखा जा सकता है तो हरि बोल का मार्मिक उद्घामटन भी अनेक स्तरों पर व्यवस्थाओं पर करारी चोट कही जा सकती है। विशेष उल्लेखनीय यह भी है कि सहज सरलतम रूप से अभिव्यंजित संग्रह की अपने अंदाजे-बयां के भरोसे नए पाठकों को जोड़ने का कार्य करेंगी। कहानी कला के अनेकानेक मुकामों के पश्चात यह निरूपण हमारी वाचिक परंपरा का स्मरण करता है। निश्चय ही नई कृति पुरानी अवधारणा के लिए चुनौती पैदा करती है । अब देखना यह होगा कि हिंदी पाठक समाज इस संग्रह की कहानियों और उपन्यास को किस रूप में स्वीकार करता है और जैसा कि मैंने आरंभ में कहा कि किसी भी कृति के पाठ के तुरंत बाद बहुत जल्दी में कोई टिप्पणी अवसर की मांग तो हो सकती है, किंतु उस कृति विशेष पर गहरे चिंतन-मनन के अधिकार का हनन भी है। अपनी इस पाठकीय-टिप्पणी के अंत में यह कहते हुए कि साहित्य को सामाजिक संदर्भ देने की चुनौतियां में “सवालों में जिंदगी” और “खारा पानी” जैसी कृतियों का पाठ निश्चय ही अपने सामाजिक को  संबल देने वाला बनेगा, इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ आभार कि आपने मुझे यहां यह अवसर प्रदान किया।
 




20/01/2014 "दैनिक भास्कर" बीकानेर / पॄष्ठ संख्या-5



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