Sunday, December 28, 2014

बेहतरीन उपन्यास “इन्सानों की मंडी”

जीवन के मर्म को समझने की दिशा

श्री मधु आचार्य “आशावादी” का बेहतरीन उपन्यास “इन्सानों की मंडी” / डॉ. नीरज दइया

(दिनांक 28-12-2014 रविवार को कवि-उपन्यासकार श्री मधु आचार्य “आशावादी” की पुस्तकों के लोकार्पण के अवसर पर पठित पत्र-वाचन )

मधु आचार्य “आशावादी” के नवीन उपन्यास “इन्सानों की मंडी” और कविता-संग्रह “मत छीनो आकाश” के लोकार्पण-समारोह के अवसर पर सर्वप्रथम मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूं। आज के इस दौर में जब साहित्य और लेखन से समाज दूर होता जा रहा है, उसके पास अवकाश ही नहीं है। लेखन को किसी काम की श्रेणी में नहीं माना जा रहा है, ऐसे समय में इस काम के प्रति निरंतर आस्था बनाए रखना बेहद कठिन होता जा रहा है। आश्चर्य होता है कि मधु जी अपनी अति-व्यस्तताओं के बीच, अपने समय में से बहुत सारा समय लेखन के लिए कैसे निकाल लेते हैं! गत दो वर्षों का आकलन करें तो पाएंगे कि वे सर्वाधिक लिखने और पुस्तकें सामने लाने वाले लेखक के रूप में उभर कर सामने आते हैं। अठारह के करीब किताबें प्रकाशित हो चुकी है और कोई आपके काम के विषय में चर्चा करता है तो भास्कर का जिक्र ही आता है। समाज में संपादक के रूप में कार्य-गरिमा स्वीकार्य है, और प्रयास यह है कि समाज में लेखन को कार्य के रूप में गरिमा स्थापित होनी चाहिए।  
      आज के इस अवसर पर सृजन से संबंधित मैं अपनी कुछ बातें आपसे साझा करना चाहता हूं। विचार की अपनी कोई भाषा नहीं होती है। कोई विचार संसार की किसी भी भाषा में आकार ग्रहण कर सकता है। हमारे भीतर विचारों के आने-जाने का सिलसिला लगा रहता है। यह जटिल प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। हमारे चाहने या न चाहने का इसमें कोई विकल्प नहीं। लेखक-कवि अपने विचारों का पीछा करते हैं। किसी विचार को समझना और कागज पर उतारना सरल नहीं और साहित्य के क्षेत्र में इस कार्य की जटिलता कई गुना कही जा सकती है। हर लेखक का एक ही सपना होता है कि उसका विचार पाठक तक पहुंच जाए। मधु आचार्य “आशावादी” ने अपने हर उपन्यास में विचारों की दुनिया से पाठकों का रिस्ता बनाने का सफल प्रयास किया है।     
      यदि मैं मेरे एक विचार को किसी पंक्ति के रूप में प्रकट करता हूं कि “इन्सानों की मंडी” उपन्यास मधु आचार्य “आशावादी” का बेहतरीन उपन्यास है। आपका प्रतिप्रश्न होगा- बेहतरीन क्यों है? क्या बेहतरीन है? सवाल और संदेह करना हमारी स्वतंत्रता है। सवाल और संदेह होने चाहिए और निरंतर होने चाहिए। क्योंकि हम नहीं जानते कि कौनसे सवाल और संदेह से हमारी यात्रा का प्रस्थान बिंदु निर्मित होने वाला है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि हम अपने में इतने खो गए हैं कि हमारे सवाल और संदेह सभी सोए हुए हैं। एक उपन्यासकार के रूप में मधु आचार्य “आशावादी” ने कुछ सवालों और संदेहों को जाग्रत करने का काम किया हैं।
सवाल और संदेह उपन्यास “इन्सानों की मंडी” के शीर्षक में ही समाहित है। इन्सानों की मंडी क्यों है? यह इन्सानों की मंडी क्या है? यह पूरी प्रक्रिया है। मधु आचार्य “आशावादी” के पूर्व उपन्यासों का स्मरण करें तो यहां इस उपन्यास तक पहुंचना एक यात्रा लगेगी। “गवाड़”, “मेरा शहर”, “खारा पानी” और “हे मनु!” के नायकों अथवा कथा की भी मूल प्रवृति किसी न किसी विचार से जुड़ी है। क्या इसे हम इस रूप मे कह सकते हैं कि उपन्यासकार को यह विचार खलता रहा कि मेरा शहर की गवाड़ के बीच इन्सानों की मंडी का भी विचार होना चाहिए। मैं मानना है और आप भी इससे सहमत हो सकते हैं कि हमारे सवाल और संदेह ही हमें सदैव चुनौतियों को स्वीकारने की हिम्मत देते हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही जहां हम विश्व-ग्राम की बात कर रहे हैं, वहीं हमारी बहुत करीब की एक दुनिया है और जहां के इन्सानों को मंडियों में पहुंच कर खुद को बेच देने का विकल्प झेलना पड़ रहा है। बिकना उन इन्सानों की मजबूरी है। “इन्सानों की मंडी” की कथा हमें बेचैन करने वाली है। विकास की बात और आकंडों को दिखाने वालों के सामने “इन्सानों की मंडी” अपने आप में एक प्रमाण है कि हमें इन बातों पर पुर्नविचार कर लेना चाहिए। असल में उपन्यास के नायक मुकुन्द की सह-नायक आलोक के माध्यम से पूरी यात्रा सही अर्थों में स्वयं को आलोकित करने की यात्रा है। आप उपन्यास से नई रौशनी में आ सकते हैं और इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि आप किसी की दुनिया में नई रौशनी के खुद को माध्यम भी बना सकते हैं। एक रचना की सार्थकता इसमें है कि उसे पढ़कर हम स्वयं में किसी बदलाव को महसूस करें। इस उपन्यास में ऐसा एक विकल्प है। इसके विस्तार में कहा जाना चाहिए कि यह उपन्यास हमें इन्सान बनाने और बने रहने के विकल्प स्मरण करता है।
      उपन्यास “इन्सानों की मंडी” में बेहद सरल और साधारण सी लगने वाली मजदूर-गाथा को उठाया गया है। यह गाथा हम अपने शहर में या किसी भी शहर में हम देख सकते हैं। सुबह सुबह कुछ लोग खुद को बेचने के लिए किसी स्थान विशेष पर एकत्र होकर इस दुनिया की दौड़-भाग में शामिल होते हैं। बिकने वाले भी इन्सान है और खरीदने वाले भी इन्सान है। इन्सान के श्रम का यह व्यपार वर्षों से चला आ रहा है। इस पर सवाल और संदेह उपन्यास के माध्यम से “आशावादी” करते हैं। उम्दा बात यह है कि उनके सवाल और संदेह उपन्यास पढ़कर हमारे बन जाते हैं।
      आज जब पूरी दुनिया में मशीनों का आतंक है और इन्सान भी अपनी संवेदनाओं की बली देकर मशीनों में तब्दील होते जा रहे हैं। ऐसी इस दुनिया में मशीन-इन्सानों का संवेदनशील इन्सान के रूप में रूपांतरण अथवा पुनर्स्थापना करना ही उपन्यास का मुख्य उद्देश प्रतीत होता है। इन्सानों के शोषण की इस कथा को प्रगतिवादी सोच कह देने भर से समस्या हल नहीं हो जाती। दुनिया का सच यह है कि गरीब और अमीरों कि इस दुनिया में गरीब कम और अमीर अधिक है। अमीर का अभिप्राय उन इन्सानों से है जिनको जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए बिकने पर मजबूर नहीं होना पड़ता है। जो बिकने पर मजबूर है वे खुद को गरीब माने तो यह सच हो सकता है किंतु हमारी दुनिया में अमीर भी खुद को गरीब ही मानते हैं। जिस घर में दो सौ –चार सौ रुपये आते है या लाखों-हजारों रुपये आते हैं वे सभी खाते तो रोटी ही है।
विज्ञान की इतनी प्रगति के बाद भी हर इन्सान के पेट की आग का निदान नहीं किया जा सका है। “इन्सानों की मंडी” उपन्यास पेट की आग का एक परिदृश्य हमारे सामने खोलता है जिससे हमें सबक लेना है। प्रतिदिन की समस्या है भूख और इस समस्या का हल निकालने वाला कोई आविष्कार होना शेष है। हम ऐसा नहीं कह सकते कि ऐसा नहीं हो सकता है। सब कुछ हो सकता है। जब इन्सान खुद अपनी संवेदनाओं और मानवीय गुणों को भूल कर खुद को मशीन बना कर अपनी दुनिया में रह सकता है तो उसके लिए मुश्किल कौनसा काम है? उपन्यासकार मधु आचार्य “आशावादी” उपन्यास “इन्सानों की मंडी” में ऐसा कोई समाधान हमारे समक्ष प्रस्तुत नहीं करते हैं। वे इस मजदूर-महागाथा को इसके अनेक घटकों को समाहित करते हुए अंत में उसी जमीन से ही प्रतीक रूप चेतना को जाग्रत होते हुए दिखाते हैं।
“इन्सानों की मंडी” उपन्यास में जहां मजदूरों की शहर में अलग-अलग मंडियां है तो वहीं उनके अलग-अलग वर्ग भी हैं। युवा और व्यस्यक मजदूर, प्रौढ़ और बूढे मजदूर, महिला मजदूरों के अतिरिक्त बाल-श्रम और भूखमरी के दिनों में कचरा बिनते या कचरे में भोजन तलाशे बच्चों की अनेक उप-कथाएं इस उपन्यास में समाहित है। पूरे उपन्यास की सफलता का श्रेय इसकी भाषा और संवादों को दिया जा सकता है। सरल-सहज भाषा में संवाद बेहद प्रभावशाली है। मेरा मानना है कि इस उपन्यास को मधु आचार्य “आशावादी” ने एक सफल नाटककार होने से ही इसे अंत तक ले जाने की समर्थता हासिल है, यह केवल किसी कथाकार के बस की बात नहीं थी। उपन्यास में नाटककार का प्रखर रूप सामने आता है। सधी हुई भाषा और संवाद इस उपन्यास के प्राण कहें जा सकते हैं। असल में यह पूरा उपन्यास एक विमर्श है। उपन्यास के रूप में इसे रचने से विषय की प्रभावोत्पादकता निसंदेह बढ़ी है। उपन्यासकार हमारे मन के भीतर प्रवेश कर उसे कहीं स्थायी स्पर्श करता है इसिलिए मैंने आरंभ में इसे बेहतरीन उपन्यास की संज्ञा दी थी। यह रचना अंततः अपने उद्देश्य में सफल होती है।
कोई लेखक इस विमर्श को लेकर उपन्यास की तुलना में इसे किसी वैचारिक निबंध के रूप में लिखना पसंद कर सकता था। इस विषय पर वैचारिक निबंध लिखें गए हैं और लिखे जाते रहेंगे। मेरी अपनी सीमाएं है और मैंने इस विषय पर ऐसा पहला उपन्यास “इन्सानों की मंडी” पढ़ा है। यह मुद्दा ज्वलंत और प्रासंगिक है। इस समस्या को कौन देखेगा? किसकी जिम्मेदारी है ऐसे लोग? घर-परिवार की जिम्मेदारी घर-परिवार के मुखिया की होती है और वह या उसके स्थान पर उसके परिवार का कोई सदस्य इस जिम्मेदारी का वाहन करता है, करना चाहता है। सवाल और संदेह के घेरे में वे लोग हैं जो हमारे समाज-गांव-शहर और देश की जिम्मेदारी का दावा तो करते हैं। यह एक पूरी शृंखला है। इस कार्य में समाजसेवी संस्थाएं भी अपने अपने ढंग से जुटी है। हम सभ्य से सभ्य होते जा रहे हैं। ऐसी बस्तियों और लोगों के बीच यदा-कदा जाकर हम अपने दानी और दयावान होने का दंभ भी पोषित करते हैं। इन सब के बावजूद यह एक सच्चाई है कि यह एक समस्या है और बड़ी समस्या है। चलिए इसका हल जब-तब होगा, किंतु फिलहाल हम इतना तो कर ही सकते हैं कि इस उपन्यास को पढ़कर ऐसे इन्सानों से किए जाने वाले हमारे व्यवहार को कुछ संतुलित करने की जिम्मेदारी को समझे। हम इन्सानों के श्रमजीवी होने का सम्मान करें। यह उपन्यास श्रम की महत्ता को उजागर करता हुआ हमारे भीतर उसके महत्तव को प्रतिप्रादित भी करता है, वहीं मजदूर ही नहीं व्यापक रूप में हर इन्सान के प्रति हमारी संवेदनाओं को भी जाग्रत संतुलित व्यवहार का पाठ भी पढ़ता है। उपन्यास का सह-नायक आलोक सूत्रधार के रूप में बिना उपदेशक का रूप धारण किए पाठकों को आलोकित करता हुआ जीवन के मर्म को समझने की दिशा भी देता है।  
मधु आचार्य आशावादी अपने पूर्व उपन्यासों में प्रयुक्त शैल्पिक आयुध यहां भी प्रयुक्त करते हैं। इन्सानों की मंडी उपन्यास की कथा ग्यारह भागों में रची गई है और प्रत्येक भाग के लिए पृथक शीर्षक उपन्यासकार ने दिया है। उपन्यासकार की खूबी है कि वह अपने पात्रों को जहां कथा-विकास के मार्ग पर रेखांकित करता चलता है वहीं पाठकों को भी किसी नाटक के दर्शक के रूप में घटनाक्रम से इस प्रकार जोड़े रखता है कि वह धीर-गंभीर कथा में उतरता हुआ अंत की प्रतीक्षा करता हैं। यह ऐसा समापन है कि इसका अंदाजा हमें पहले नहीं होता। यहां इस प्रभावशाली शैली को उपन्यासकार की निजता के रूप में रूढ़ होते हुए देखा जा सकता है।
मेरा मनना है कि उपन्यास के लिए किसी भी लेखक का लंबा चिंतन हुआ करता है और मधु आचार्य “आशावादी” ने हमारी संवेदनाओं को जाग्रत करने वाले इस उपन्यास को बहुत विचार-मंथन के बाद ही उतारा है। कला हमें संस्कारित करती है, वह हमारे भीतर परिवर्तन लाती है। साहित्य के रूप में उपन्यास विधा के माध्यम से हमारा यह संस्कारित-परिवर्तित और परिवर्द्धित होना हम यहां देख सकते हैं। अपने उद्देश्य से परिपूर्ण इस उपन्यास के लिए एक बार फिर से उपन्यासकार-कवि मधु आचार्य “आशावादी” को बधाई देना चाहता हूं। अपनी कविताओं में एक जगह मधु आचार्य “आशावादी” लिखते हैं- “आज कहता हूं खुलकर / हवाओं का रुख बदलना आता है मुझे।” यह उपन्यास के पाठ को आत्मसात करने के उपरांत हमें लगता है कि हमारे भीतर की हवाओं का रुख बदल गया है।
अब कविता की करें तो मेरी आवधारणा है कि “मत छीनो आकाश” की कविताएं कवि की निजी संवेदनाओं का काव्य-रूपांतरण है, वहीं इनमें अनेक संकेत और संदर्भ भी हैं। सर्वाधिक प्रभावशाली बात जिस से मैं प्रभावित हूं कि कवि के रूप में कविताएं लिखते समय मधु आचार्य “आशावादी’ अपने कहानीकार और उपन्यासाकार होने से मुक्त जाते हैं। मेरी त्रासदी यह है कि मैं इनके कथाकार रूप से मुक्त नहीं हो पाता। मैं सीधे-सीधे यही कह रहा हूं कि मुझे आज लोकार्पित दोनों पुस्तकों में उपन्यास मुग्ध करने वाला लगा। परिहास में कहे तो उपन्यास अपनी अनेक उपकथाओं के उपरांत भी एक है और कविताओं को देखें तो इनका वितान बहुत बड़ा और गहरा है। आकाश को नहीं छीनने की बात है। आपको क्या यह विरोधाभास नहीं लगता कि अपने उपन्यास में धरती की बात करने वाले कवि आचार्य कविताओं में आकाश की बातें करते हैं। असल में यह रचनाकार को अपनी दुनिया को पूर्णता देना है बिना आकाश के धरती नहीं होती और ऐसी कोई धरती नहीं जिसका आकाश नहीं हो।
फिलहाल मैं कविता की बात करने से इसलिए भी कतरा रहा हूं कि एक पूरे उपन्यास जिस में संवेदनाओं के खो जाने और उनकी पुनर्स्थापना की बाते मैं कर रहा था, वहीं उन्हीं संवेदनाओं के अनेक रूपों के साक्ष्य कविताओं में मुझे प्रतीत होते हैं। हमारे यहां कहा भी जाता है कि ठंडा और गर्म साथ नहीं होना चाहिए। तो नर्म नर्म और कुछ उष्मित-सी कविताओं में डूबने-डूबोने का दायित्व मंच पर उपस्थित हमारे आज के अतिथियों को सौंपता हुआ मैं आपसे विदा लेता हूं। आपका आभार कि आपने मुझे ध्यान से सुना और आयोजक संस्था का भी आभार कि मुझे अपनी बात साझा करने का अवसर दिया। आभार।

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