Friday, December 25, 2015

जूंण दांई फगत दोय ओळी री है कविता

आलोचक नीरज दइया री काव्यगत सोच: कैवणौ है वौ कैय लेवौ, ‘पाछो कुण आसी’

० दुलाराम सहारण
 केई कैवै कै धीरज रै खूटणै रौ औ जुग है। पण ‘म्हैं परखणौ नीं चावूं- आप रौ धीरज, क्यूंकै म्हैं आगूंच जाणूं- आप रौ धीरज है आप मांय...’ पण कैवणिया तौ कैवै ई है कै धीरज तौ नित खूटै। कदास आ साची-सी लागै, क्यूकै आ तौ थे जाणौ ई हौ कै ‘दुनिया भींतां सूं भरीजगी’, अैड़ी थिति में धीरज कैड़ी थिति में है, जिकर री बात कोनीं। अर इणी बिचाळै धीरज परखण री म्हैं कदै-कदास सोच ई लेवूं। पण तद हाथूंहाथ ई मन मांय आ आवै कै धीरज रौ ठाह तौ खुदौखुद बगत आयां लाग जासी, कै पछै जद आप भचीड़ौ खासौ तद ठाह लाग जासी, पण साथै ई बैम हुवै कै जीयाजूंण में केइयां रै ‘भचीड़ौ लागै अर ... ठाह ई नीं पड़ै’ तद के करीजै?
म्हैं कवि हूं इणी कारणै इत्ती दोगाचींती में हूं। ब्योपारी कै नेता हुवतौ तौ अजै तांणी आप रौ धीरज कदास रौ ई पितायण लेवतौ। पण कवि तौ कवि ई हुवै। कवि कनै बळ हुवै कविता रौ। थे जांणौ ई हौ कै कवि री ‘कविता रै साथै ग्यान अर थावस तौ हुवै ई हुवै, साथै हुवै आखै रचाव अर बांचणियै मिनख री मनगत।’ अर थे इयां ई जांणौ, आ मनगत बांचनै म्हैं डांफाचूक हुय जावूं। बदळतै बगत नै झीणी-भांत निरखनै तौ और ई डांफाचूक हुय जावूं। क्यूंकै बदळतै बगत में प्रेम रा नवा खांचा घड़ीजै अर औ खरौ साच है कै प्रेम बावळौ कर सकै, ‘प्रेम ई कर सकै- साच साम्हीं हरेक नै आंधौ।’ तद बावळौ अर आंधौ करण रौ औ हथियार म्हैं म्हारी कविता में बरतूं कै नीं बरतूं? धीरज धरूं कै नीं धरूं? आ दिक्कताई है। म्हारी कविता म्हैं कठै सूं सरू करूं, आ ई दिक्कताई है। क्यूंकै मन अबै मन नीं रैया। घर अबै घर नीं। मन मिनख री ओळख हुवै अर ‘घर जीवण खातर हुवै/बेमन जीवणौ/आपरै घर मांय/मरणौ हुवै।’, पण ‘जीसा!/ थे बणायौ/ वौ घर अबै कोनीं/भाई कैवै- घर है।/इसै घर बाबत/म्हैं कांई कैवूं जीसा?’
ओहौ! बत कठै सूं सरू हुयी ही अर कठै खुद रै तांण आय ऊभी हुयगी। थे ई म्हनै कैयसौ कै ‘खुद रौ स्वाद सगळां माथै मती थोप्या करौ।’ पण थे कैवौ भलांई, म्हारै में तौ ‘दाळ में पैलपोत कांकरौ जोवण री कुबाण पड़गी।’ अबै आ कुबांण ‘आलोचक’ में नीं पड़सी तौ किण में पड़सी? म्हैं कवि ई नीं, आलोचक ई हूं। आ तौ थे जांणौ ई हौ। अर पछै थे आ ई जाणता हुयसौ कै म्हारौ अठै धरम बणै कै इण कविता पोथी ओळाव कीं कांम आलोचना रौ ई कर लेवूं। तद ई तौ बात फबसी। पैलां केई सबदां री विगत जांण लेवां- ‘‘पोथी? आलोचना? कविता?’’
अबै थै औ सवाल कर सकौ कै ‘‘केई मोटा-मोटा सबद अेकण साथै कियां? सगळी विगत अेकण साथै ई सूंपसौ के?’’ पण म्हारौ उथळौ ई सुण लेवौ- ‘फूल रै साथै कांटा अर डाळी तौ हुवै ई हुवै।’ पण आ ई समझौ कै वींरै साथै ई ‘हुवै वा आंख, जिकी जोवै रंग अर आखौ सैचन्नण संसार आपां रौ।’
इणी कारणै म्हारी वीं आंख सूं ई 70 जोड़ 16 इयांकै 86 पानां में 57 जोड़ 14 इयांकै 71 कैयीजती कवितावां मारफत थांनै जुग रौ साच दीखायसूं। ध्यांन राखजौ, आंख री बात करी हूं, आंख्यां री नीं!
हां, अबै कीं आंख रै चितरांम संू बारै आवां अर कविता रै जोड़ै बात करां तद ‘पैली विचार कर लो/ थे ओळखौ तौ हौ कविता...?’ कोनीं ओळखौ तद पछै पैलांपैल थे देखौ-समझौ कै कविता हुवै के है? आ समझ लेयसौ, तद पछैई म्हैं कविता करसूं। हां तौ समझौ-
‘कविता होवै- सबदां री अनोखी मुलाकात/ है आ आपसरी री बात...।’ पण आ आपसरी री बात कविता में इयां ई बण जावै, आ बात कोनीं, क्यूकै ‘किणी रै कैयां सूं कोनीं लिखीजै कविता.../ ... बरसै तौ बरसै अर नीं बरसै.../...बरसां रा बरस कोनीं बरसै.../....किणी री मजाल कै अेक छांट ई बरसा लेवै बिना मरजी...।’ पण आ तौ थे ई जांणौ हौ कै ‘कविता लिखणौ/ किणी पूजा सूं कमती नीं है/ ना ईज किणी रौ/ भोग टाळण सूं कमती है।’,
पण औ ई अेक बीजौ साच है कै ‘ठावी ठौड़ मिलण री जेज है, किणी ओळी मांय मिलतां ई, वाजिब जागा खिलतां ई, बण जावैला कविता...।’ पण औ ई सै सूं लूंठौ तौ औ साच है कै ‘हरेक कविता, कविता कोनीं हुवै!’ औ म्हैं जाणूं। अर आ ई जांणूं कै सबद-सबद जोड़नै ई कविता राचीज सकै। पण सबद-सबद जोड़नै राचीजेड़ी कविता रै ओळै-दोळै म्हैं ‘क्यूं करूं म्हैं हिसाब...,’ क्यूंकै- ‘...अट्टा-सट्टा करीज सकै सबदां रा!’
घणी बात क्यूं करां। क्यूंकै अबै तौ थारै कीं पल्लै पड़ी हुयसी? पड़ी तौ ठीक है, नींतर म्हारी आ बात तौ पल्लै लेय ई लेवौ कै म्हैं कविता क्यूं लिखूं?
म्हारी बात सुणनै आप हांसौ? पण अेकर ‘हंसण री बात नै तौ जावण दां/ पण रोवण री टैम तौ रोवां/ असली रोवणौ, बस,/ इणी खातर, म्हैं लिखूं- कविता।’ पण म्हैं तौ कैवणौ चावूं खरी बात, वा आ है कै ‘कविता हिम्मत देवै।’ अर तद ई कवि कविता लिखै।
आ हीम्मत कियां आवै, कविता रै बख पांण ई तौ। पण औ बख कठैई कुणई सीखावै कोनीं। थे ई जांणौ- ‘कविता कियां लिखीजै?/ इण माथै कोई किताब कोनीं।,/ कविता क्यंू लिखीजै/ इण माथै कोई जवाब कोनीं।’ पण म्हैं तौ इत्तौ जांणूं कै कवि ‘धूड़ माथै कविता’ ई लिख सकै अर धूड़ ई कविता लिख सकै। आ ई क्यूं खुद री बात करूं तौ ‘म्हैं धूड़ हूं/ लिखतौ रैवूं-/ धूड़ माथै कविता।’
अबै म्हारी इण पोथी री कविता कांनी आवौ।
ओहौ! कविता तौ टाळवीं ई है। मतलब गिणती री ई है। पण पछैई म्हैं सोचूं कै इण पोथी रै ओळाव जकौ कैवणौ है वौ तौ अबार कैय ई देवूं। दोय-च्यार ओळी में। खासकर कविता के हुवै अर कविता मांय के हुवै, इण पेटै तौ पक्कायत ई कैय देवूं। ‘आ कुण देखै’ कै वा कविता बणी कै नीं बणी, क्यूंकै औ तौ आकरौ साच है ई- ‘जे मानौ तौ/ हुवै कविता, कविता।’ अर नीं मानौ तौ हुवै फगत कीं सबद। पण कवि सारू तौ ‘कविता हुवण संू बेसी/जरूरी है आपरौ विचार/ कविता नै/कविता गिणनौ।’
पण म्हारौ धरम लिखणौ है। हेलौ करणौ है। अर तद ई ‘म्हैं हेलौ करूं/हेला माथै हेलौ करूं/बारंबार करूं/दिन-रात करूं/मन-आंगणै करूं...।’
क्यूं करूं आ ई सुणौ। इणी कारणै करूं कै ‘कदैई तौ सुणैला थूं!’
मानता रै टोटै भलांई 'बिना भासा रै/घूमा म्हे उभराणां!' पण जद सुणैला तद फगत म्हारी मायड़ भासा राजस्थानी में ई सुणैला। अर अै हेला जोर सूं सुणैला क्यूकै म्हे 'नित कटीजां/मांय रा मांय/दिन—रात चूंटीजां/बट—बटीजै जबान/इण गत रै पाण ई तौ/मांड राख्यौ है— /मरणौ...।' मरणौ मांडेड़ा रा हेला री विगत तौ थे जांणौ ई हौ। म्हारी कविता री बात अेक पासौ धरौ, पण थे हेलौ सुणौ। 'कविता सूं पैली जरूरी हुवै भासा री संभाळ' अर म्हैं तौ अठै इण पोथी रै ओळाव 'भासा री हेमाणी लियां ऊभौ हूं म्हैं...।'

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पाछो कुण आसी/नीरज दइया/सर्जना प्रकाशन, बीकानेर/2015/96 पेज/140 रिपिया।
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 दुलाराम सहारण 15 सितम्बर 1976 भाडंग (तारानगर) चूरू में जलम। एम. ए. अर एल.एल.बी.। बाळपणै सूं ई साहित्य मांय रुझान। इंटरनेट अर संस्थागत अनेक कामां सूं सांवठी ओळखाण राखणिया सहारण आज मानीजता वकील है। विविध विधावां में लेखन। ‘पीड़’ कहाणी-संग्रै माथै साहित्य अकादेमी रो युवा लेखक पुरस्कार। ‘क्रिकेट रो कोड’ अर ‘जंगळ दरबार’ बाल साहित्य री पोथ्यां छप्योड़ी।
ठिकाणो : प्रयास भवन, ताजूशाह तकिए रै साम्हीं, चूरू
मोबाइल : 9414327734
ई-मेल : drsaharan09@gmail.com

Sunday, December 13, 2015

संवेदनशीलता को बचाने की एक मुहिम : मधु आचार्य की रचनात्मकता

विपुल मात्रा में साहित्य-लेखन हेतु चर्चित नामों में इन दिनों मधु आचार्यआशावादीशामिल है। आपके उपन्यासों के क्रम में हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, के बाद अपने हिस्से का रिश्ताछठा हिंदी उपन्यास है। राजस्थानी और हिंदी में समान रूप से लिखने वाले भाई आशावादी के उपन्यासों में यदि राजस्थानी उपन्यास गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोगको शामिल करें तो इसे नौवा उपन्यास कहा जाएगा। यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि आचार्य ने विविध विधाओं में समान गति से लिखा है, और इसी क्रम में उनका पहला बाल-उपन्यास अपना होता सपनानई शुरुआत है।
      सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनोके बाद अब अनछुआ अहसास और अन्य काहनियांआपका छठा कहानी-संग्रह प्रकाशित हुआ है। ऐसे में कहा जाना चाहिए कि कथा-विधा में मधु आचार्य आशावादीने अपनी रचनात्मकता के बल पर बहुत कम अवधि में राजस्थान से एक शिखर जैसा कीर्तिमान स्थापित किया है। जैसा कि मैंने कहा कि आप विविध विधाओं में सक्रिय हैं, गद्य और पद्य में समान गति से लेखन कर रहे हैं। आज आपके सातवे कविता संग्रह देह नहीं जिंदगीपर मेरे मित्र सुरेश हिंदुसतानी अपनी बात रखेंगे, मैं गद्य विधा की तीन पुस्तकों पर अपनी बात रखने की अनुमति मंच से चाहता हूं।
            सर्वप्रथम हम मधु आचार्य ‘आशावादी’ के बहाने एक रचनाकर के सृजन-लोक की बात करें कि कोई रचनाकार अपने भीतर ऐसा क्या पाता है कि उसका निदान वह अपनी रचना के माध्यम से करता है। रचनाकार भी समाज का एक सामान्य प्राणी ही होता है और हर रचनाकार के समक्ष किसी भी रचना से पूर्व अनेकानेक सवाल और संदेह होते हैं, और संभवतः इसी कारण हर रचनाकार अपनी सृजन-प्रक्रिया में बारंबार नवीन सृजन से स्वयं को प्रमाणित करता है। असल में कोई भी रचना रचनाकार के रचनाकार होने का प्रमाण ही तो है। 
      रचना एक नितांत व्यक्तिक कार्य है और उसका प्रकाशन-लोकार्पण उसे अपने लोक को समर्पित कर देना। लोक में रचना को समर्पित करने के पीछे का भाव निसंहेह अपने लोक को रचना द्वारा आलोक देना भी हुआ करता है। हर रचनाकार की अपनी सृजन-प्रक्रिया हुआ करती है, ऐसा भी कहा जा सकता है कि प्रत्येक रचना का जन्म अपनी पूर्ववर्ती रचनाओं से भिन्न होता है। इसी के रहते भिन्न-भिन्न प्रविधियों और कुछ चयन द्वारा किसी रचना को अभिव्यक्त होने का मार्ग रचनाकार खोजता हुआ सक्रिय रहता है। किसी भी पाठ में निहित अभिप्राय और संकेतों के साथ अनेक संदेह-सवाल हम तक शब्दों के माध्यम से पहुंचा करते हैं।
      शब्दों में पूर्व निहित अर्थ और अभिप्राय हर बार नवनीन विन्यास में नए अर्थ और अभिप्रायों को व्यंजित करने को बेचैन रहते हैं। इसी बेचैनी को रचना का उत्स भी कहा गया है। ऐसी बेचैनी यथार्थ के चित्रण में अपनी त्वरा के साथ प्रकट होती है। ऐसी ही कुछ विचार-भूमि को लिए हुए मैं मधु आचार्य ‘आशावादी’ की नवीन कृतियों के समीप पहुंचने की कोशिश करता हूं। असल में हर रचना के पाठ में अपनी पूर्ववर्ति भूमिका लिए हुए ही कोई पहुंचा करता है। यदि हम स्वयं का गत आकलन मिटाना चाहे तो भी यह संभव नहीं होता। ऐसी हमारी और हर रचना-पाठ की नियति है। मुझे लगता है कि साहित्यकार आशावादी की इन तीन पुस्तकों में प्रेम और संघर्ष की विभिन्न मनःस्थितियां उम्र के भिन्न-भिन्न सौपानों में घटित होते हुए प्रस्तुत करने की अभिलाषा उनके सृजन की प्रेरणा अथवा भूमिका रही है।
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                  मधु आचार्य ‘आशावादी; के ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’ संग्रह में सात प्रेम कहानियां संग्रहित है। इन कहानियों की पृष्ठभूमि प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष किसी सत्य पर आधारित प्रतीत होती है। कहानी सत्य पर ही आधारित हो, ऐसा अनिवार्य नहीं हुआ करता किंतु इन कहानियां में जो अभिव्यक्त है, उससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है जो अभिव्यक्त नहीं है किंतु उसे प्रस्तुत करने का यहां प्रयास किया गया है। यहां यह सर्वाधिक आकर्षित करने वाला तथ्य है कि इन कहानियों में युवा प्रेम का आवेग उफान पर चित्रित और चिह्नित किया गया है। इस युवा-आवेग को बिना जाने-समझे इन कहानियों की पूर्णता को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इन कहानियों के पाठ में प्रेम की अनेक घटनाएं नाटकीय और कपोल-कल्पना अथवा बिलकुल असत्य जैसी प्रतीत हो सकती है, किंतु मेरा मानना है कि इनके पाठ के बाद तत्काल ऐसा कहना थोड़ी जल्दबादी होगी। यदि आप किशोरावस्था और किशोर-मनोविज्ञान के अध्येता रहे हैं तो आपको वही स्थितियां सहज और स्वाभाविक लगेंगी जो बहुत सरसरी निगाह में मिथ्या प्रतीत होती हैं। मधु आचार्य की कहानियां अपनी पठनीयता एवं संवेदनशीलता के बल पर पाठकों को बांधे रखने में सक्षम हैं। मॉरीशस के साहित्यकार राज हीरामन के अनुसार- ‘पारिवारिक और सामाजिक सीमाओं को लांघती, रूढ़ीवाद की दहलीज के अंदर दम तोड़ती और संघर्ष करती सातों कहानियां प्यार से लबालब है। न कहीं कम, न कहीं ज्यादा!
      विभेद की दृष्टि से प्रेम के सफल अथवा असफल होने का विभाजन किया जा सकता है, और राज हीराम ने पुस्तक का फ्लैप लिखते हुए ऐसा किया भी है, किंतु इस विभाजन से भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है मधु आचार्य द्वारा आधुनिक संदर्भों में इक्कीसवी सदी की युवा पीढ़ी के प्रेम का बदलता रंग-रूप चिह्नित कर रेखांकित करना। यहां पाठ की कुछ सहमतियां और असहमतियां प्रेमचंद द्वारा रचित निबंध ‘साहित्य का उद्देश्य’ की इन पंक्तियों के माध्यम से देखी-समझी जानी चाहिए। बकौल प्रेमचंद- ‘साहित्य केवल मन-बहलाव की चीज नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है। अब वह केवल नायक-नायिका के संयोग-वियोग की कहानी नहीं सुनाता, किंतु जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है, और उन्हें हल करता है।’ मेरा मानना है कि आज हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारे प्रेम से जुड़ी है अथवा प्रेम ही उन सभी समस्याओं का उत्स है।
      तकनीकी क्रांति और बदलते सामाजिक परिवेश में जीवन-मूल्य ढहते जा रहे हैं। इन सब के बीच बाह्य और आंतरिक संघर्ष का संताप हम ढो रहे हैं। ऐसे में अपनी इन कहानियों में अनेक स्थलों पर कहानीकार ने हमारे आस-पास के घटनाक्रम द्वारा हर पीढ़ी को आगाह करते हुए जैसे कुछ कहने का आगाज किया है। यह कहना किसी उपदेश अथवा संदेश की मुद्रा में नहीं वरन कहानी के स्वर में ऐसा गुंथा है कि वह हमें पाठ में स्वयं प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए संग्रह की कहानी ‘धुंधला-धुंधला आकाश’ नायिका पूजा की प्रेम कहानी है, जो असल में तीन पीढ़ियों के बीच बदलते संबंधों की कहानी है। इस में बीच की पीढ़ी का दायित्व-बोध कहानी में मुखरित है, किंतु साथ ही यह संदेह भी यहां अभिव्यंजित होता है कि क्या ऐसा होना चाहिए।
      कहानी ‘लड़कपन’ की नायिका सीमा आत्म-हत्या कर लेती है, और इसे अमर-प्रेम की संज्ञा देती है। यहां यह संदेस है कि यह अमर-प्रेम नहीं वरन एक आवेग है। अब भी हमारे समाज में रूढ़िग्रस्त मानसिकता और विभिन्न विभेदों की दीवारें प्रेम को रोकती-टोकती है। प्रेम की जटिलता और द्वंद्व का चित्रण कहानी में देखा जा सकता है।
      कहानी ‘खेजड़ी की साख’ की नायिका लक्ष्मी का प्रेम उसके वर्तमान को धवस्त कर देता है और वह प्रेम की असफल से मनोरोगी होकर जीवन जीने को मजबूर होती है। यहां ठाकुर और किसान में वर्गों का विभेद और संबंधों को एक उदाहरण के रूप में समझा और देखा जाना चाहिए। कहानीकार प्रेम को विभन्न कोणों द्वारा देखना-समझना और समझाना चाहता है।
      सुमन और अशोक की प्रेम कहानी है ‘अनछुआ अहसास’, जिसमें मनीषा के माध्यम से प्रेम-विवाह का एक सत्य अथवा संदेह प्रकट होता है। कोई भी घटना किसी वर्तमान के समक्ष प्रमाण हुआ करती किंतु ऐसा ही होगा यह संभव होने का प्रमाण नहीं होती है। प्रेम-संबंधों में हल्की-सी चूक थोड़ी-सी नादानी और नासमझी सब कुछ तबहा और बरबाद कर देती है। कहानी में परिवार का कहना मानना एक संदेश है, किंतु उससे भी बेहतर इसे कहानी में विकसती विवेक सम्पन्नता के रूप में देखा जा सकता है।
      ‘अधूरा सपना : अधूरा इजहार’ की नायिका नीलम प्यार में जान दे देती है। ऐसी घटनाएं समाज में होती है और उस क्षण विशेष की विवेकहीनता के परिणाम को कहानी अपने सुंदर संवादों, सहज भाषा और कथानक के साथ अनेक मनोभावों को प्रकट करती हुई, युवा पीढ़ी को समझने के साथ समय रहते संभाल जाने का एक जरूरी संदेश भी देती है। इसी भांति कहानी ‘अनकहा सच’ में ललिता का संकल्प है तो ‘अधूरी प्यास’ में जीवन के एकाकीपन में चीनी कम जैसा कथानक जवान और कच्ची उम्र के गलत फैसलों का विवरण भी है।
      समग्र रूप से ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’ का पाठ प्रेम के विविध रूप से रू-ब-रू होने जैसा है। प्रेम का होना जीवन में बेहद जरूरी है। मैं यहां अपनी काव्य पंक्तियों का स्मरण करता हूं- जो है खिला हुआ/ उस के पीछे प्रेम है/ जहां नहीं है प्रेम/ वहां सुनता हूं-/ खोखली हंसी। मित्रो, इस कहानी-संग्रह को हमारी खोखली होती हुई हंसी को बचाने के रचनात्मक उपक्रम के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
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     बाल उपन्यास ‘अपना होता सपना’ में कथा-नायक नितिन की संघर्षभरी प्रेरक कहानी है। जिसमें कर्मशील नितिन का चरित्र एक आदर्श के रूप में सामने आता है। शीर्षक में कौतूहल है कि सपना क्या और कौनसा है? जो अपना कैसे होता है। रूढ़ अर्थों में सपना तो सच और झूठ होता है। या फिर सपने को हम अपना और पराया कहते हैं। खुली आंख से देखा गया सपना ही असल सपना होता है। यह कुछ ऐसा ही सपना था, जिसे सरल-सहज प्रवाहमयी भाषा में रचा गया है। बालमन के समक्ष यह सपना जीवन में कुछ आगे बढ़ कर कुछ कर दिखाने का जजबा जाग्रत करने वाला है। दूसरे शब्दों में ऐसा ही कुछ कर दिखाने का यह आह्वान भी है।
      उपन्यास अपने मार्मिक स्थलों और तीन-चार बिंदुओं के कारण बाल-पाठकों के अंतस को छू लेने का सामर्थ्य रखता है। कहा जाता है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। अगर उनकी लगन सच्ची हो तो उनको कोई रोक नहीं सकता। इसका एक उदाहरण उपन्यास में नितिन है। वह संस्कारवान बालक है। उसने जीवन में कभी सच्चाई का दमान नहीं छोड़ा। ऐसे प्रेरक चरित्रों के बल पर ही बालकों को शिक्षा मिल सकती है। नैतिक मूल्यों और संस्कारों को पोषित करता मुख्य रूप से बाल साहित्य का उद्देश्य माना जाता रहा है। इस बाल-उपन्यास में मितव्यायता और दूरदृष्टि के साथ नेक इरादों की सफलता का मूल मंत्र एक चरित्र के माध्यम से शब्दों में मूर्त होता है।
      हम व्यस्कों को चाहिए कि बच्चों को आज के हालातों से जितना जल्दी हो सके वाकिफ करा देंवे। यह दोनों पक्षों के लिए उतना ही समयानुकूल है, जितना जीवन के लिए हवा-पानी। आर्थिक समस्याओं से ग्रसित आज समाज में जहां सुख का अकाल है, वहीं मीडिया द्वारा सुनहले सपनों को विभिन्न रूपों में परोसा जा रहा है। यांत्रिक होते मानव-समाज के बीच बाल साहित्य के रचनाकारों को सुकोमल बचपन को बचना है। आज जब साहित्य से समाज दूर होता प्रतीत होता है, ऐसे समय में बाल साहित्य लेखन की सार्थकता बढ़ जाती है। संभवतः ऐसे ही हमारे प्रयासों से बच्चों में शब्दों के प्रति आकर्षण पैदा करने में सफलता मिलेगी। बाल-पाठकों के लिए ‘अपना होता सपना’ का पाठ आकर्षण लिए हुए है, हमें बस उन तक इसे पहुंचा देना है।
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      हमारे कुछ रचनाकार मित्र मधु आचार्य ‘आशावादी’ के लेखन को लेकर उसकी निरंतरता और सक्रियता पर हाथ खड़ा करते हैं। किसी भी स्थान पर जहां प्रश्न रहते हैं, वहीं प्रतिप्रश्न भी उपस्थित हुआ करते हैं। उदाहरण से इस बात को स्पष्ट करना चाहता हूं कि जब हम कहीं एक सवाल ‘क्यों’ करते हैं, तो तत्काल भीतर दूसरा सवाल- ‘क्यों नहीं’ भी जाग्रत होना चाहिए। जो मित्र ऐसा नहीं करते हैं वे ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने सृजन को लेकर बरसों से दोनों हाथ खड़े कर रखें हैं। निरंतर लेखन की जहां अनेक संभावनाएं होती हैं वहां सीमाएं भी होती है। मैं रचनाशीलता का सम्मान करते हुए बहुत विनम्रता के साथ निवेदन करता चाहता हूं कि किसी भी रचना को उसकी संभवानाओं और सीमाओं में जांचा-परखा जाना चाहिए।
      मेरे विचार से उपन्यास ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ को एक विचार प्रधान कथा कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्यों कि यह रचना परंपरागत औपन्यासिक ढांचे का विचलन है। मधु आचार्य अपने पूर्ववर्ती उपन्यासों में भी प्रयोग करते रहे हैं और इसमें भी प्रयोग किया गया है। यहां कथानक का विकास नाटकीय ढंग से किया गया है, जो किसी चित्रपट की भांति पाठकों को अपने पाठ में मुग्ध किए रखता है। ‘आशावादी’ की पूर्ववर्ती अनेक रचनाओं पर मैंने समय-समय पर अपनी बात रखी है और मुझे उनका नियमित पाठक और वक्ता होने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ है। मुझे लगता है कि निरंतर कथा-विधा में सृजनरत रहते हुए मधु आचार्य ने अपनी शैल्पिक संचरना को निर्मित कर लिया है। यहां रचना-घटकों में संवाद-भाषा के रूप में उनकी निजता को रेखांकित किया जाना चाहिए। उनका किसी कथा के प्रति संरचनात्मक कौशल जिस शिल्प और भाषा में अभिव्यंजित होते हुए रूढ़ता को प्राप्त होता जा रहा है, यह एक विशिष्टता है। इसे पृथक से पहचाना गया है। फ्लैप पर कवि-कहानीकार डॉ. सत्यनारायण सोनी ने लिखा है- ‘एक ही सरल रेखीय दिशा में बहती हुई यह कथा लम्बी-कहानी की शक्ल लिए हुए है। पाठक को बांधने में सक्षम तथा एक ही बैठक में पढ़ी जाने लायक। कहूं तो- लेखक कमाल का किस्सागो।
      किसी रचना के विधागत स्वरूप पर विचार करने के साथ-साथ उसके उद्देश्य को भी देखा-समझा और निर्ममता से परखा जाना चाहिए। उद्देश्य-पूर्ति के पूर्वनिर्धारण से कथा दौड़ती हुई चलती है और पाठक को अंत तक बांधे भी रखती है, किंतु इस गति में आस-पास की अनेक संभावनों को भी देखा-समझा जाना अनिवार्य है। अस्तु कहा जाना चाहिए कि उपन्यास की महाकाव्यात्मक अपेक्षाओं से भिन्न मधु आचार्य ‘आशावादी’ अपनी भाषा, संवाद और चरित्रों के मनोजगत द्वारा कथा में एक त्वरा का निर्माण करते हैं। अगर कोई ऐसी त्वरा अपने पाठकों को संवेदित करे और मानवता के लिए उनके अंतस में कुछ करने की भावना का बीजारोपण करे तो इसे रचना और रचनाकार की बड़ी सफलता के रूप में आंका जाना चाहिए।
      यह मेरा व्यक्तिगत मत है किसी भी साहित्यिक-रचना को बंधे-बंधाए प्रारूप में देखने-समझने के स्थान पर नवीन रचना के लिए नए आयुधों पर विचार किया जाना चाहिए। अब पुराने आयुधों को विदा कहने का समय आ गया है। ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ की बात करें तो उपन्यास की नायिका को उसके बाल्यकाल में स्वजनों द्वारा मनहूस की संज्ञा दे दी जाती है। उन परिस्थियों और घटनाओं के क्रम में यह कोई नई बात नहीं लगती। वह अपने माता-पिता के विछोह के बाद निरंतर संघर्ष करती है। संवेदनाओं से भरी इस मार्मिक कथा में जो संवादों के माध्यम से नाटकीयता द्वारा जीवन के यर्थाथ को उभारने का कौशल प्रकट हुआ है वह प्रभावित करता है। बालिका जीना चाहती है, वह पढ़ना-लिखना चाहती है। उसका परिवार उससे जैसे किनारा करता चलता है। इच्छाओं के दमन के दौर उस बालिका को मौसी की अंगुली थामने का सु-अवसर मिलता है, यहां मिलता शब्द के स्थान पर लिखा जाना चाहिए कि वह अपने विवेक से उसे हासिल करती है और हर असंभव को संभव बनाती है। संभवत इसी कारण उसे उचित परवरिश में मौसी के घर पलने-बढ़ने के अवसर से वह डॉक्टर बनती है। एक संवेदनशील युवती के रूप में वह मावनता को अपना धर्म समझती हुई एक इतिहास रचती है।
      आज जब समाज में धन की अंधी-दौड़ चल रही है। चिकित्सा पेशे में सेवा के भाव और भावना से अधिक कुछ कमा कर निरंतर आगे बढ़ जाने की होड़ लगी हो, ऐसे दौर में यह कथा प्रेरणा देती है। आधुनिक और बदलते सामाज के बीच यह एक ऐसा अलिखित इतिहास है, जो किसी भी इतिहास में कहीं दर्ज नहीं होगा पर मधु आचार्य ने इसे दर्ज कर दिया है। ‘आशावादी’ अपनी पूर्ववर्ती रचनाओं में भी अनेक मार्मिक विषय को लिपिबद्ध कर चुके हैं, उसी शृंख्ला में ‘अपने हिस्से का रिश्ता’ को देखा जाएगा।
      उपन्यास की नायिका सीमा अंधे भिखारी में अपने खोए हुए रिश्ते को जैसे तलाश करती है, उसके कार्य-व्यवहार और विचार झकझोर देते हैं। इस मर्म को उद्धाटित करते हुए डॉ. सत्यनारायण सोनी ने लिखा है- ‘जिस दौर में जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसे विष तेजी से फैलाए जा रहे हैं, उसी दौर में मानवता का संदेश देने वाली यह अनूठी कथा बताती है कि महज धन कमा लेना ही जीवन का मकसद नहीं होता।'
      समग्र रूप से कहना चाहता हूं कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ हमारे यांत्रिक होते समय-समाज और पूरे तंत्र के बीच जिस संवेदनशीलता को बचाने की मुहिम में अपनी पूरी रचनात्मकता के साथ जुटे हैं, जुटे रहें। आपका निरंतर सृजन सदा सक्रिय बने रहें और हर बार नवीन रंगों की मोहक छटा प्रगट होती रहे। अंत में सुरुचि प्रकाशन के लिए सूर्य प्रकाशन मंदिर के भाई श्री प्रशांत बिस्सा एवं मनमोहक आवरणों के लिए भाई श्री मनीष पारीक को बहुत-बहुत बधाई और मंगलकामनाएं अर्पित करता हूं। मुझे फिर फिर अवसर देने के लिए आयोजक मित्रों के लिए ‘हार्दिक आभार’ जैसे शब्द को उसकी पूरी अर्थवता के साथ यहां दोहराना चाहता हूं। धन्यवाद। आभार।
(13 दिसम्बर 2015, रविवार को धरणीधर रंगमच,बीकानेर) 








Wednesday, December 02, 2015

रिश्ते

आप कहते हो-
हमें नाकारा -नालायक
काम के नहीं किसी भी
मगर हम, जब भी पुकारोगे
होंगे हाजिर जैसे भी हैं
दूजे कहाँ से आएँगे?
कहाँ से लाओगे?
ले भी आए तो
धो देने से नहीं धुलेंगे
रिश्ते हैं जो भी

-नीरज दइया

( कवि की छाया, व कविता मूल राजस्थानी से अनुवाद-अनिरुद्ध उमट)

Tuesday, November 24, 2015

साहित्यकार मधु आचार्य एवं डा. नीरज दइया तैस्सीतोरी अवार्ड से सम्मानित

बीकानेर । राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के शोध अध्ययेता इटली विद्वान डा. एल. पी. तैस्सीतोरी की 96 वीं जयन्ती के अवसर पर सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा राजकीय संग्रहालय परिसर में तैस्सीतोरी प्रतिमा स्थल पर “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तैस्सीतोरी के कार्यो की उपादेयता” पर चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिन्दी राजस्थानी के साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी एवं डा. नीरज दइया को “तैस्सीतोरी एवार्ड-2015” अर्पित किया गया।

कार्यक्रम के अध्यक्ष बीकानेर पश्चिम के विधायक डा. गोपाल जोशी ने कहा कि डा. एल. पी. तैस्सीतोरी ने इटली से आकर यहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के शोध का कार्य किया, हमें अपनी मायड भाषा पर गर्व होना चाहिये। उन्होंने कहा कि राजस्थानी को संविधान की 8 वीं अनुसची में मान्यता मिलते ही इसका ज्यादा विस्तार होगा। उन्होंने कहा कि पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ जिस रफतार से किताबें लिख रहे हैं उससे लगता कि पुस्तक सृजन का शतक जल्द पूरा करेंगे। उन्होंने कहा कि डा. दइया अच्छे समालोचक हैं जिनकी सोच सामाजिक है। डा. जोशी ने कहा कि आशावादी एवं दइया को डा. तैस्सीतोरी सम्मान मिलना गरिमामय है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डा. महेन्द्र खडगावत ने कहा कि डा. एल. पी. तैस्सीतोरी ने 5 वर्ष तक इस क्षेत्र में खोज की उसकी सर्वे रिपोर्ट अभिलेखागार में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि तैस्सीतोरी ने राजस्थानी गीत भी लिखे। डा. खडगावत ने कहा कि मधुजी और डा. दइया के उर्जावान रचनाकर्म को तैस्सीतोरी की तरह याद रखा जायेगा।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि डा. तैस्सीतोरी ने पश्चिम राजस्थान में शोध कार्य किया, उसके प्रमाण पाकिस्तान के पुस्तकालयों में भी मिलते हैं। विशिष्ट अतिथि चेन्नई प्रवासी जमनादास सेवग ने कहा कि पत्रकार मधुजी और आलोचक नीरजजी को यह एवार्ड मिलना गौरवपूर्ण है।

आरंभ में कार्यक्रम के संयोजक एवं कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट की गतिविधियों का विस्तार से परिचय देते हुए वर्तमान एवं भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्था अध्यक्ष डॉ. गोपाल जोशी एवं सचिव डा. मुरारी शर्मा के द्वारा सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट की गरिमामय परंपरा को सहेजने का महत्त्वपूर्ण कार्य बहुत गंभीरता से किया जा रहा है। संस्था प्रयासरत है कि पत्रिका का फिर से प्रकाशन आरंभ किया जाए तथा प्राचीन पांडुलियों के संरक्षण की भी व्यापक व्यवस्थाएं की जा रही है। सचिव डा. मुरारी शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि कोई भी संस्था अपने सतत कार्यों की वजह से पहचान पाती है और जिसकी पहचान पहले से ही बनी हुई हो उसे बनाए रखने का दायित्व संस्था से जुड़े सभी स्वजनों का होता है।

व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि सादुल राजस्थानी इंस्टीटयूट आजादी से पहले से गठित गौरवशाली संस्था है। उन्होंने कहा कि मुझे गत वर्ष तैस्सीतोरी एवार्ड से नवाजा जा चुका है, जिसे मैं अकादमी पुरस्कार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। लेखक अशफाक कादरी ने मधु आचार्य ‘आशावादी’ के कृतित्व एवं उपलब्धियों तथा कवि राजाराम स्वर्णकार ने डा. दइया की सृजन यात्रा पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में अतिथियों ने साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी एवं डा. नीरज दइया को शॉल ओढ़ाकर, सम्मानपत्र, स्मृतिचिह्न, पुस्तकें एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में सखा संगम के चन्द्रशेखर जोशी, खुशल चंद रंगा, बृजगोपाल जोशी द्वारा केसर सम्मान अर्पित किया। सम्मान से अभिभूत मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि यह एवार्ड मेरे लिए अकादमी एवार्ड से भी बडा है, क्यों कि इस संस्था का इतिहास बहुत प्राचीन और समृद्ध रहा है। इस संस्था से अनेक मूर्धन्य साहित्यकार जुडे रहे है और उनके कार्यों का राजस्थानी साहित्य एवं परंपरा में उल्लेखनीय स्थान है। डा. नीरज दइया ने कहा कि किसी भी सम्मान से लेखक की सामाजिक स्वीकृति का पता चलता है, साथ ही सम्मान से रचनाकार की अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ जाती है। मैं अपने लेखन द्वारा प्रयास करूंगा कि सम्मान देने वाली संस्था और अपने साहित्यिक समाज के निकषों पर निरंतर खरा बना रह सकूं।

डा. बसन्ती हर्ष ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा संचालन कार्यक्रम के संयोजक राजेन्द्र जोशी ने किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’, भंवरलाल ‘भ्रमर’, डा. किरण नाहटा, शमीम बीकानेरी, सरदार अली पडिहार, पत्रकार लूणकरण छाजेड, जब्बार बीकाणवी, मोहनलाल मारू, पार्षद प्रेमरतन जोशो, रामदेव दैया, वरिष्ठ चित्रकार मुरली मनोहर के. माथुर, डा. उषाकिरण सोनी, जयचन्दलाल सोनी, डा. अजय जोशी, हाजी मोहम्मद युनुस जोईया, श्रवण कुमार, सुरेश हिन्दुस्तानी, अनिरूद्ध उमट, नवनीत पांडे, हरीश बी शर्मा, प्रशान्त बिस्सा, इरशाद अजीज, अमित गोस्वामी, असित गोस्वामी, महेन्द्र जैन, राकेश कांतिवाल, संदीप पडिहार, चतरा राम, डा. कल्पना शर्मा, बाबूलाल छंगाणी, चन्द्रशेखर आचार्य, नदीम अहमद ‘नदीम’, कवयित्री मोनिका गौड, वली मोहम्मद गौरी, जाकिर अदीब, इसरार हसन कादरी, शशि शर्मा, डा. नमामी शंकर आचार्य, मईनुदीन कोहरी, आत्माराम भाटी, डा. एस. एन. हर्ष, बुनियाद जहीन, प्रमोद चमोली, शमशाद अली, लक्ष्मण मोदी, योगेन्द्र पुरोहित सहित अनेक गणमान्य नागरिक साहित्य प्रेमी शामिल थे।
























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