Sunday, May 24, 2015

कथा-कृतियां- “@ 24 घंटे” व “सुन पगली”


[श्री मधु आचार्य “आशावादी” की पुस्तकों के लोकार्पण-समारोह(दिनांक 24-05-2015) के अवसर पर पठित पत्रवाचान / डॉ. नीरज दइया]

गरिमामयधरणीधर रंगमंच के प्रणेता और कार्यक्रम के अध्यक्ष माननीय श्री रामकिशनजी आचार्य,जयपुर से पधारे मुख्य अतिथि वरिष्ठ उपन्यासकार आदरणीय श्री हरिराम जी मीणा,विशिष्ट अतिथि कवयित्री श्रीमती रजनी भारद्वाज, तीनों कृतियों के रचनाकार बड़े भाईश्री मधु आचार्य “आशावादी”, इस कार्यक्रम के संचालक भाई हरीश बी. शर्मा के सदन मेंविराजित आदरणीय श्री विद्यासागर आचार्य, डॉ नंद किशोर आचार्य, गुरुवर श्रीभवानीशंकर व्यास ’विनोद’, श्री लक्ष्मीनारायन रंगा, श्री भंवरलाल ‘भ्रमर’, श्रीखुशाल चंद व्यास, डॉ. अजय जोशी, डॉ. मुरारी शर्मा, श्री मालचंद तिवाड़ी, श्री आनंदवी. आचार्य, श्री संतोष चालके, श्री संजय पुरोहित, कहानीकार श्री बुलाकी शर्मा,श्री राजेंद्र जोशी, श्री नवनीत पाण्डे, श्री रवि पुरोहित तथा आप समस्त सुधिजनों को प्रणामकरता हूं कि हम सब इस यादगार-ऐतिहासिक आयोजन के साक्षी हैं।

यहां एकस्पष्टीकरण करना जरूरी है कि मेरे कुछ मित्र शब्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं औरतत्काल जिज्ञासु बन कर सवाल भी कर बैठते हैं। यकीन कीजिए कि मैं मंच से हर शब्दबहुत नाप-तोल कर ही बोलता हूं, और जो कुछ कहता हूं उसके पीछे कोई ठोस तथ्य होताहै। मैंने इस आयोजन को ऐतिहासिक इसलिए कहा है कि यह बीकानेर और राजस्थान में ही नहींवरन पूरे भारत में पहली बार हो रहा है कि किसी रंगमंच पर तीन विभिन्न विधाओं की एकही रचनाकार की किताबें लोकार्पित हों और साथ ही ऐसे रचनाकार की जो अपनी मातृभाषाराजस्थानी में भी तीन किताबें विविध विधाओं की जल्द ही लोकार्पित करवाने का संकल्परखता हो। यहां विश्व इतिहास इसलिए मैंने इसलिए नहीं कहा कि मैं इतिहास का नहीं,विज्ञान और भाषा का विद्यार्थी रहा हूं, और कुछ बातें आपके लिए भी छोड़नी जरूरीसमझता हूं।
क्षमाकरें, मैं अपने मूल विषय पर आता हूं और आज की लोकार्पित तीन में से दो गद्यपुस्तकों पर अपनी बात रखने की अनुमति मंच से चाहता हूं। “@ 24 घण्टे” मधु आचार्य“आशावादी” का पांचवा उपन्यास है, इससे पूर्व उनके “हे मनु!”, “खारा पानी”, “मेराशहर” और “इन्सानों की मन्डी” उपन्यास हिंदी में प्रकाशित हो चुके हैं। इसमें यदिआपके राजस्थानी लेखन को भी शामिल किया जाए तो कहना होगा कि “@ 24 घंटे” सातवां उपन्यास है, क्योंकि “गवाड़” और “अवधूत” आपके दो राजस्थानी उपन्याससामने आ चुके हैं। इसी भांति “सुन पगली” आपका तीसरा अथवा राजस्थानी कहानी संग्रहको शामिल करते हुए कहें तो चौथा कहानी संग्रह है। पूर्व हिंदी में “सवालों मेंजिंदगी”, “अघोरी” तथा राजस्थानी में “उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज” कहानी संग्रह प्रकाशितहुए हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह लेखन पिछले दो-तीन वर्षों में सामने आयाहै, इससे यह प्रमाणित होता है कि आप कथा-विधा में आप निरंतर सक्रिय रहे हैं। आपकीकविताओं पर हमारे वरिष्ठ रंगकर्मी कवि-मित्र भाई सुरेश हिंदुस्तानी अपनी बातरखेंगे।
मेरे लिएयह बेहद सुखद है कि मैंने रचनाकार श्री मधु आचार्य “आशावादी” की सृजन-यात्रा कोबेहद निकटता से देखाने-परखने का सौभाग्य पाया है। आप व्यक्ति के रूप में जैसे सहज-सरलऔर सर्वसुलभ हैं वैसे ही रचनाकार के रूप में दंभ रहित निरंतर स्वयं को परिष्कृतकरने का जज़बा और जनून लिए अपने समय के वरेण्य रचनाकर भी हैं। आपकी निरंतर सक्रियताऔर लगातार प्रकाशनों की शृंखला किसी जादू के उनमान है, किंतु असल में आपका सृजन केप्रति समर्पण और खासकर समय-प्रबंधन वंदनीय है। कहना न होगा कि इन सब के पीछे एकमहत्त्वपूर्ण घटक आपका अनुशासन है, जो आपमें आपके पत्रकार-संपादक और उससे भी कहींअधिक अनुभवी नाट्य-निर्देशक, अभिनेता होने से स्वतः समायोजित है।
यहां तक पहुंच कर अब मैं दो राहे पर आ खड़ा हुआ हूं कि कौनसीकिताब की चर्चा पहले करूं। यहां यह सवाल इसलिए भी जरूरी है कि आलोचना में कोई भीचयन बिना किसी दृष्टिकोण और विवेक-रहित नहीं होता है। एक जिज्ञासा के रूप मेंविन्रमता पूर्वक मैं अपना सवाल रखना चाहूंगा कि उपन्यास और कहानी विधाओं में जोतात्विक भेद है, उसके रहते मधु आचार्य “आशावादी” अपने उपन्यास और कहानियों कोक्यों इतना करीब ले आते है कि उनमें भेद करना जरा कठिन-सा हो जाता है। साथ ही यहतथ्य भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि प्रयोगधर्मी रचनाकार भाई आशावादी हर कृतिमें अपनी अर्जित जमीन छोड़, फिर-फिर किसी नए अलहदा अनुभव को अभिव्यंजित करने कासाहस करते हैं। आपके पास रचने को बहुत कुछ नए जीवनानुभवों के साथ विषयों का अखूटअंबार है।

मंच की गरिमा और समय-सीमा के लिहाज से अपनी सुविधा औरचयनाधिकार का उपयोग करते हुए आज लोकार्पित प्रायोगिक उपन्यास “@ 24 घंटे” पर पहले बात रखना चाहता हूं।सर्वप्रथम तो इसका शीर्षक बेहद नवीनता लिए लुभाने वाला है। साहित्य-संसार में यहपहली ऐसी औपन्यासिक रचना है कि जिसमें इस नवीन संकेत को काम में लिया गया है। यह लेखकका समय के साथ बदलती भाषा को अंगीकार करना है। उपन्यास के शास्त्रीय पक्ष के विद्वानोंने जिन औपन्यासिक तत्वों को सूचिबद्ध किया है, उनमें देशकाल और समय का विशेषमहत्त्व रखा गया है। उपन्यासकार मधु आचार्य “आशावादी” ने अपने इस नए उपन्यास मेंप्रयोग के लिहाज से इस घटक को परंपरागत रचना मानकों से जुदा करते हुए कालखंड कोसंकुचित किया है। इसमें एक आख्यान को विविध रंगों के साथ वर्णित करने हुए नवीनशैल्पिक-अनुसंधान से केवल 24 घंटे में समग्र जीवन की अवधारणाप्रस्तुत करने का साहस देखा जा सकता है। उपन्यास के मुख्य पात्र के रूप में युवानायक अनुभव के अनुभवों की एक शृंखला जैसे-जैसे उपन्यास में व्यंजित होती है, उसमेंरिश्तों के साथ परिवार, समाज, प्रेम, राजनीति, व्यापार, जीवन-मरण आदि के अनेकानेकप्रसंगों का वर्णन मिलता है। विबिध रंग-रूप से गुजरता यह घटना-वर्णन सिर्फ औरसिर्फ एक दिन के घागे में पिरोने का निवार्हन है, कि अंततः पाठक को लगता है- 24 घंटे में गुंथी यह जिंदगी उसकी अपनी जिंदगी है। उसकेआस-पास की जिंदगी है। यही इस उपन्यास की सार्थकता है।
उपन्यास “@ 24 घंटे” का आरंभ “उठ जाग मुसाफिर भोर भई” जैसी मंगल प्रभाती से होता है। मुख्यपात्र अनुभव नींद से जागता है। अनुभव को अहसास होता है कि दादी मां जाग गई हैं।उपन्यास में दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है। उन्होंने पूजा-पाठ के लिए तैयारीआरंभ भी कर दी है। इसका अभिप्राय कि दादी मां रात्री के अंतिम प्रहर में जाग करअपनी नियमित दिनचर्या आरंभ करती है, और उनका यह जागरण ही उपन्यास की कथा कीप्रस्तावना है। यहां प्रथम पृष्ठ के अनुच्छेद से मैं आपको सीधे अंतिम पृष्ठ पर लेजाना चाहता हूं, जहां अबुभव की दादी का देहावसान हो जाता है। उसके पापा, मां औरमाधव काका का विलाप है। यहां अनुभव के साथ एक अन्य पात्र श्याम भी उसके दुख मेंशामिल है। इस दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो यह उपन्यास असल में अनुभव की दादी केजीवन का एक अंतिम दिवस, एक त्रासदी के रूप में प्रतीत होता है।
उपन्यास की एक उल्लेखनीय तथ्य है कि दादी जीवन के अंतिम दिवसअपने पौत्र अनुभव में संस्कारों संवर्धन देखती है। यहां पीढ़ियों में संस्कारो कायह स्थानांतरण देखना और पाना जैसे दादी की पूंजी है। मधु आचार्य “आशावादी” कीविशेषता है कि वे पात्र अनुभव के माध्यम से कुछ स्थानीयता के बल पर लोकानुभवों कारचाव करते हैं। उदाहरण के लिए उपन्यास के आरंभ में अनुभव अपनी दादी से अज्ञा लेकरएक अंतरंग प्रश्न पूछता है- “दादी, पापा आपके इकलौते बेटे हैं, फिर भी तुम उनसेज्यादा मुझे महत्तव देती हो। मुझे अपना खास मानती हो। ऐसा क्यूं?” इस मासूस सेसवाल पर कुछ भावुकता के बाद जो दादी का जबाब है, वह उल्लेखनीय है और उस जबाब कासंबंध-संदर्भ उपन्यास के अंतिम पृष्ठ के अनुच्छेद भी जुड़ता है। दादी कहती है- “देखबेटा, दुनिया में हर इंसान को मूल से अधिक प्यार उससे मिलने वाले ब्याज से होताहै। यही कारण है बस।“ अब अंतिम पृष्ठ की बात करें जहां दादी के देहावसान पर अनुभवका स्वकथन है- “आज तुमने साबित कर दिया कि ब्याज तो ब्याज है, असल तो मूल है। अपनेबेटे के सामने दम तोड़ा। मेरा इंतजार भी नहीं किया। मैं तो ब्याज हूं। रिश्ता औरस्थायी प्रेम तो मूल से ही होता है। समझ गया मैं।“
भले आप-हम इसे पात्र की भावुकता कहें किंतु यह भाषिक संरचनारचना को जिस स्थानीयता और लोकानुभव से जोड़ती है उससे रचना में प्रखरता के साथनिजता भी आती है। उपन्यास में ऐसे अनेक स्थल है जहां वर्णित लेखकीय मौलिकता मेंनिजता और लौकिकता उपन्यास को प्रभावी बनाती है। उपन्यासकार मधु आचार्य “आशावादी” कीइस निजता स्थानीयता से युक्त लोक-भाषा का अंदाज रेखांकित किया जाना चाहिए जो उनकोसमकालीन उपन्यासकारों से एक अलग परिवृत में उल्लेखनीय बनाने वाला है। उपन्यास मेंमुख्य पात्र अनुभव की निरंतर कर्मशीलता और धैर्य के साथ जीवन पथ पर सदा आगे आगेअग्रसर रहने की भावना उसे अविस्मरणीय नायक का गौरव प्रदान करती है।
मधु आचार्य “आशावादी” जी के पाठक जानते है कि वे अपनेउपन्यास “गवाड़”, “हे मनु!”, “खारा पानी”, “मेरा शहर”, “अवधूत” और “इन्सानों कीमन्डी” में प्रयोगों के साथ उपस्थित हुए हैं, जिनमें समय को कोलाज के रूप मेंप्रदर्शित करना, उपन्यास में नाट्य तत्वों-घटकों का प्रयोग, जमीन समस्याओं परमर्मस्पर्शी महागाथाओं का प्रस्तुतीकरण, ज्वलंत विषयों का संवेदना के स्तर परहृदयस्पर्शी अंकन हो या फिर आलेख के विषय के विचार का कथा-रूपांतरण आदि अनेक घटकोंऔर बिंदुओं के विस्तार में जाने का यह अवसर नहीं है। अस्तु यहां यह इंगित करनाजरूरी है कि उपन्यासकार जीवन के जटिल से जटिल प्रश्नों को जिस सरलता-सहजता औरप्रवाहशीलता के साथ व्यंजित करता है, उसमें निसंदेश अभिव्यंजना के अनेकानेक रंग केसाथ उद्देश्य भी समाहित है। आज हुए लोकार्पित उपन्यास का सूक्ष्म तंतु यह भी है किकहने को हमें 24 घंटेमिलते हैं, किंतु इस समयावधि में निद्रा का समय कर्मशीलता से विलगित स्वत शेष रहताहै। क्या किसी पूरे जीवन की कल्पना चौबीस घंटों से भी कम की समयावधि में संभव है?उपन्यास में यह बिंदु जहां प्रश्न के रूप में वर्णित है, तो उसका हल भी समाहित है।
ईश्वर भी नींद में सुला कर हमारे 24 घंटे के अंतराल से कुछ समय जैसे काट कर हीहमें प्रतिदिन प्रदान करता है। उपन्यास को अगर हम समय घटक के आधार पर देखें तो हिंदूधर्मानुसार दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल और रात के चार प्रहर- प्रदोष,निशिथ, त्रियामा एवं उषा मिलाकर 24 घंटे यानी आठ प्रहर होते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे का होताहै। उपन्यास में यह जीवन का यही त्रासदी है कि व्यक्ति का पूरा समय ही स्वयंव्यक्ति के हाथ में नहीं। उपन्यास के आरंभ के प्रहर में गायन,पूजन, जप और प्रार्थना का महत्व नई पीढ़ी द्वारा व्यंजित करनामंगलाचरण जैसा है। उपन्यास के फ्लैप पर हिंदी और राजस्थानी के कवि-उपन्यासकार अतुलकनक लिखते हैं- जीवन के एक दिन की सामान्य शुरूआत इस उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु है,जो अपनी समग्रता में समकालीन सामाजिक जीवन की विसंगतियों से लेकर प्रेम के पवित्र रूहानीरिश्ते के बिखर जाने पर भी उसकी सौंधी-सौंधी गंध स्वयं में समेटते हुए कुछ जरूरी बातेंसोचने पर पाठक को बाध्य करता है।
भारतीय सामाजिक ढांचे में आई विभिन्न विद्रूपताओं औररूढ़ियों पर उपन्यास में व्यंग्य मिलता है, तो कहीं परोक्ष-अपरोक्ष रूप से अन्याय काप्रतिकार भी। आज का समय जैसा-कैसा भी है, किंतु यह विशद, बहुआयामी और विविधवर्णीरंगों में समायोजित है। इसकी जटिलता उपन्यास में समाजिक संरचना में बदलती स्थियोंके साथ देखी-समझी जा सकती हैं। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा, बाहुबलियों के सामने लोकतंत्रकी असहायता और परिवार की जटिलताएं आदि स्थियों को उपन्यास में गंभीरता से उठायागया है। उपन्यास में विरोधाभासपूर्ण स्थियों को पात्रों के संवादों, कार्य औरआचार-व्यवहार के माध्यम से प्रकट किया गया है। एक स्थान पर नियमों को को मानने नमानने के संदर्भ में पंक्ति आती है- कौन मानता है आजकल ?कानून बनाने वाले भी तो अपने बनाये कानूनों पर नहीं चलते।ऐसे स्थलों पर जहां किसी व्यक्ति का विक्षोभ मुखरित हुआ हैवहीं इसे व्यष्टि से समष्टि को परिलक्षित करता प्रभावशाली अंकन भी कहा जा सकता है।यह उपन्यास है इसलिए इसमें ऐसे अनेकानेक स्थल हैं जिनमें सामाजिक सच्चाइयों कीमार्मिक अभिव्यक्ति है- एक जगह पंक्ति आती हैं- बहस ही तो खुद को बुद्धिजीवी साबितकरने का आसान जरिया है। एक अन्य स्थान कहा गया है- कार-बंगला रखने वाले भी अपने लियेबी.पी.एल. कार्ड बनवाते हैं। सार रूप कहा जाए तो असल में यह उपन्यास पात्र अनुभव केसच्चे अनुभवों का समुच्चय है।
“सुन पगली” संग्रह में दस कहानियां संकलित है- इश्तियार,सुन पगली, कन्फ्यूजन, बेटे का अधिकार, ये कौन चित्रकार, सिसकते रिस्ते, अपनी तोयही नेतागिरी, विद्रोह, अनजानी राह अनजाने साथ, थमी हुई जिंदगी। यहां समय-सीमा केरहते यह संभव नहीं कि हरेक कहानी के वर्ण्य-विषय पर चर्चा की जाए, ऐसे में कुछविशिष्ट कहानियों के विषय में कुछ संकेत ही संभव है। वैसे सभी कहानियां संवेदनाओंसे लबरेज है।
कहानियों में दो-तीन बेहद प्रभावशाली बातें इस संग्रह कीसभी कहानियों पर लागू दिखाई देती है। चरित्र की जबरदस्त पकड़ कि कहानीकार ने ऐसेचरित्रों को उठाया हैं जो हमारे इर्द-गिर्द होते हुए भी हमसे कुछ-कुछ अपरिचित औरकुछ-कुछ जैसे किसी घुंधलके में कहीं खोये हुए से हैं। यहां चरित्रों का अंकन भाषामें पाकर जब वे हमारे अंतस में प्राण पाते हैं तो वे भीतर बस जाते हैं, फिर शीर्षककहानी सुन पगली का पागल हो या फिर उस पागल की डॉक्टर हो। यह कहानी एक मनोवैज्ञानिकआधार को लेकर संवेदना जग्रत करने वाली मार्मिक रचना है। समाज के उपेक्षित समझेजाने वाले वर्ग अथवा पात्र के प्रति सहानुभूति जगाती है।
कथाकारों का यदि हम वर्गीकरण करेंगे तो पाएंगे कि औसत औरसामान्य लेखक प्रायः राजनीति से जुड़े और सरकारी नियमों के प्रतिरोधों वाले विषयोंसे बचने का सयास प्रयास करते हैं, यहां मधु आचार्यजी इसके विपरीत ऐसे ही विषयों परहाथ अजमाते हैं जो खतरनाक कहे जा सकते हैं। रचनाकार पर परोक्ष-अपरोक्ष सत्ता औरस्वयं के रोजगार के दबाब रहा करते हैं, जिसके रहते वह कुछ स्थियों पर मौन रहनाउचित मान लेता है। भ्रष्टाचार के बीच रहते हुए भी जब हम रचनाकार के रूप में मात्रचित्रण से ऐसे भयभीत रहते हैं तो समाज को जाग्रत करने और मिशन जैसी बातें बेमानीहै। इस विषयांतर को विराम देते हुए मैं मधु आचार्य “आशावादी” की कहानियों मेंचरित्रों को भाषा और संवादों के माध्यम से जीवंत कर देने के हुनर पर कहना चाहताहूं कि आपका कहानी कहने और रचने का अपना अलग अंदाज है। उदाहरण के लिए संग्रह कीपहली ही कहानी की चर्चा करें तो हमें आश्चर्य होगा कि चुनाव में साढे सात लाखवोटों में से केवल सत्राह वोट प्राप्त करने वाला पात्र जेठमल इतनी खूबसूरती से रचागया है कि एक बार कहानी पाठ से वह हमारे भीतर जैसे बस जाता है। इस कहानी पाठ केवाद जब भी चुनाव चिह्न की बात होगी या फिर आंखों के सामने केतली आएगी कि हमारेजेहन में इस “इश्तियार” कहानी का यह पात्र जेठमल निश्चित रूप से जैसे जाग कर खड़ाहो जाएगा। मेरा मत है कि ऐसा होना किसी कहानी की सार्थकता है।
असल में मधु आचार्य की अपनी कहानियों के शिल्प में नाटकविधा को प्रयोग के रूप में सहयोगी बनाते हैं। कहानी में किसी नुक्कट नाटक केसदृश्य कहानीकार स्वयं को किसी पात्र के भेष में ऐसे संवेदनात्मक स्थल पर उपस्थितकर संवाद में सहयोगी बना लेता है कि मर्म पर सीधी चोट होती है। हम यह जान भी नहींपाते कि यह जो वर्तालाप, व्यंग्य अथवा आनंद कहानी में चल रहा था, वह अचानक कहांगायब हो गया। ऐसे में कहनीकार का यह अपरोक्ष सीधा संवाद हमारे अतंस को जाग्रत करताहै। कहानी “इश्तिहार” में किसी व्यक्ति विशेष के चर्चा में आ जाने और उसके नहींरहने पर गम का नहीं होना, असल में कहानीकार को खटता है। वह काका की सूरत में स्वंयजैसे कहानी में तल्खी भरे स्वर में उतर जाता है- “तुम लोगों को उसके मरने का गमनहीं है। इस बात का गम है कि अब कोई इश्तिहार नहीं रहा। बनाना अपा लोगों का काम।ढूंढो न, फिर कोई इंसान मिल जाएगा। इंसानों को इश्तिहार बनाना आप लोगों का काम है।बना लेना उसे भी। हो जाएगा वो भी बेचार जेठमल।“ पुस्तक के फ्लैप पर कवयित्री डॉमेधना शर्मा लिखती हैं- इश्तिहार कहानी में व्यक्ति को पोस्टर बना देने की दुनियाकी आदत का प्रभावी चित्रण कहानीकार मधु आचार्य ने किया है, उस व्यक्ति कीसंवेदनाओं को इसमें पढ़ा गय है जो पोस्टर है पर इंसान भी है।
संग्रह की कहानी “कन्फ्यूजन” में वयक्ति को अपनी असमंजस कीस्थितियों के शीध्र उबरने की प्रेरणा है, तो कहानी “बेटे का अधिकार” में बेटी के सार्थककार्यों का रेखाचित्र। “ये कौन चित्रकार” कहानी हमारी संवेदनाओं में सेंध लगातीहुई एक नन्हें और मासूम चित्रकार के होने की संभावनाओं में जैसे रंग भरती है तो “सिसकतेरिस्ते” आज के आपाधापी के युग में ऐसे परिवार की कहानी कहती है जहां स्वार्थों सेसंयुक्त परिवार में टूटन और बिखराव है। पुरानी पीढ़ी के सकारात्मक सोच की मार्मिकअभिव्यंजना भी यहां देखी जा सकती है। कहानी “अपनी तो यही नेतागिरी” वर्तमान सभ्यताके सामने पनप रही छोटी और गंदी राजनीति का विद्रूप चेहरा दिखाती है तो “विद्रोह”कहानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित एक ऐसी कहानी है जिसमें बालक के विद्रोही बन जानेकी सामाजिक स्थितियों का चित्रण हुआ है, वहीं हमारे पारिवारिक दायित्व-बोध कासंकेत प्रश्नचिह्न के रूप में इसमे समाहित है। विस्तार से चर्चा को शेष रखते हुएकथाकार मधु जी को मंगलकामनाएं कि वे निरंतर सक्रिय रहे और नए मुकाम हासिल करतेरहें।
पुस्तकों के सुरुचि और गरिमामय प्रकाशन के लिए सूर्यप्रकाशनमंदिर के भाई प्रशांत बिस्सा को मैं साधुवाद देना चाहता हूं कि वे सुंदर साज-सज्जाऔर गुणवत्ता युक्त पुस्तकों का निरंतर प्रकाशन कर बीकानेर का परचम देश में लहरारहे हैं। मेरी बात को बेहद मान पूर्वक सुनने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार और अंतमें इस पूरे आयोजन से जुड़े सभी मित्रों-साथियों का आभार कि मुझे यह अवसर प्रदानकिया।

दिनांक 24-05-2015 /धरणीधर रंगमंच, बीकानेर / डॉ. नीरज दइया



(फोटो : श्री मनीष पारीक, श्री रमेश भोजक समीर)



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स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

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श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 31 जुलाई,1992
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