Sunday, July 26, 2015

"चेखव की बंदूक" यानी "बीएस फिफ्टी वन"

बुलाकी शर्मा की पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर पठित पत्र-वाचन, दिनांक 26-07-2015 बीकानेर

          आज के कार्यक्रम के अध्यक्ष मेरे आदरणीय गुरु श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ के श्रीचरणों में वंदन, कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सम्माननीय श्री लूणकरणजी छाजेड़, स्वागताध्यक्ष कवि-कथाकार श्री मधु आचार्य ‘आशावादी’, व्यंग्यकार-अनुवाद सर्वप्रिय श्री बुलाकी शर्मा, सर्वाधिक प्रिय श्री राजेंद्र जोशी, भाई शंकरसिंह राजपुरोहित, डॉ. नमामीशंकर आचार्य, डॉ. प्रशांत बिस्सा एवं आप सभी सम्मानित-स्नेही आत्मीय स्वजन।
          मुझे चेखव की बंदूक पर बोलना है और बड़े खेद के साथ कहना चाहता हूं कि मुझे चेखव की बंदूक नहीं वरन एक किताब दी गई है, जिस पर शीर्षक लिखा है- चेखव की बंदूक। मुक्ति के आमंत्रण के साथ श्री राजेंद्र जोशी ने फोन पर सूचित किया कि जल्द ही मुझे चेखव की बंदूक भेज रहे हैं और उस पर मुझे लोकार्पण में पत्रवाचन करना है। मैंने सर्वप्रथम तो विचार किया कि जोशीजी भी क्या.... अच्छे-भले कार्यक्रम करवाते-करवाते आजकल बंदूक का भी लोकार्पण करने लग गए, और वह भी चेखव की। ऐसी जबरदस्त ऐतिहासिक धरोहर जोशीजी को मिली कहां से? इससे पहले तक तो यह आलम था कि जब कभी "बंदूक" शब्द मेरे मानस पटक पर आता तो एके 47 की आकृति उभरती। अब यह आलम है- "बंदूक" शब्द के साथ जेहन में जो आकृति उभरती है, निसंदेह उसका नाम "चेखव की बंदूक" है। कवि श्री कृष्ण कल्पित ने फेसबुक पर चेखव की बंदूक के समानांतर नाम लिखा "बुलाकी की बंदूक"। लगभग चालीस वर्षों की सतत व्यंग्य-साधना के साधक श्री बुलाकी शर्मा ने उदारता पूर्वक अपने स्थान पर चेखक का नाम लिखा है। इन इक्यावन रचनाओं को देखते हुए मैं "एके47" की तर्ज पर "बीएस51" नाम प्रस्तावित करता हूं। मेरा अनुरोध है कि "बीएस फिफ्टी वन" (यानी बुलाकी शर्मा के इक्यावन व्यंग्य) का करतल ध्वनी से स्वागत करें। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा को बहुत-बहुत बधाई।
          व्यंग्य-परंपरा में श्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ का अपना कीर्तिमान है और संयोग से गुरुदेव मंचस्थ भी हैं। इस आलेख को तैयार करना, मेरे लिए बेहद कठिन रहा। किताब के विषय में लिखना हो, उसमें यदि भूमिका श्री भवानीशंकर जी की हो तो आप गए काम से। लिखते समय आप दूसरे के लिखने को कुछ छोड़ते ही नहीं, सभी खास-खास बातें तो लिख दी गई है बाकी रहा क्या है। "बीएस51" के विषय में भूमिका में कुछ विशेषताएं लिख कर स्थानाभाव के कारण अन्य विशेषताएं जो छोड़ दी गई है, मैं उन तक पहुंचने का प्रयास करूंगा। अक्सर भूमिका लेखक पुस्तक की भूमिका लिखते समय कमियां गिनाना छोड़ देते हैं, उसको भी यहां लिया जा सकता है। किंतु इसमें दो खतरे हैं। एक तो आज पुस्तक का लोकार्पण-समारोह है, पुस्तक-चर्चा का आयोजन नहीं। दूसरा खतरा तो इससे भी बड़ा और दमदार है, समझदार को इशारा ही काफी है कि जनाब मामला "बीएस फिफ्टी वन" का है और शहीद कौन होना चाहेगा। किसी व्यक्ति या संपत्ति की सुरक्षा, निजी सुरक्षा और शिकार के इस्तेमाल में लाई जाने वाली बंदूक का लाइसेंस ही आमतौर पर जारी होता है। किंतु यहां यह भी स्पष्ट करता चलूं कि "बीएस फिफ्टी वन" को लाइसेंस देने वाले व्यंग्य विधा के पंच परमेश्वर हैं- सर्वश्री भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’, फारूक आफरीदी, पूरन सरमा, अरविन्द तिवारी और यशवंत कोठरी। एक ने भूमिका लिखी है, दूसरे ने फ्लैप और अन्य तीन की टिप्पणियां "बीएस फिफ्टी वन" में दर्ज है। तिस पर यह पुस्तक बलराम और प्रेम जनमेजय को सादर समर्पित है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह सब बातें मैं अभिधा में कह रहा हूं।
          वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ के अनुसार बुलाकी शर्मा की सबसे बड़ी सफलता छोटे-छोटे लेकिन विचार-उत्पादक व्यंग्य-विषयों को कुशलतापूर्वक निभा जाना है।
          वरिष्ठ व्यंग्य-लेखक फारूक आफरीदी ने लिखा है- बुलाकी शर्मा की रचनाएं प्रतिबद्धता के साथ सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं और विद्रूपताओं के घिनौने चेहरों को बड़े करीने से परत-दर-परत बेनकाब करती नज़र आती हैं।
          हिन्दी गद्य व्यंग्य-लेखन में जिन व्यंग्यकारों ने गम्भीरता से इस महत्त्वपूर्ण व कठिन विधा को निरन्तर प्रयोगशील व सार्थक बनाया है, उनमें पूरन सरमा एक अत्यन्त विश्वसनीय व पठनीय नाम है और सरमा का शर्मा के बारे में मानना है कि व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा इस कृति में बहुत ही सधे हुए स्वरूप में सामने आते हैं और असंगत मूल्यों की बखिया उधेड़ते हैं।
          प्रतिष्ठित व्यंग्यकार अरविन्द तिवारी कहते हैं कि बुलाकी शर्मा के व्यंग्यों में जहाँ विषयों की विवधता है, वहीं प्रहार करने की क्षमता देखते बनती है।
          चर्चित व्यंग्यकार यशवंत कोठारी लिखते हैं कि व्यंग्य वही लिख सकता है जिसने जीवन में अभावों को जीया हो, सहा हो, जिसके सीने में दर्द हो। वैसा ही दर्द बुलाकी शर्मा के सीने में है और वे इसे कागज पर उतार कर हमें अनुगृहीत करते हैं।
    "बीएस फिफ्टी वन" की रचनाओं में व्यंग्य का पैनापन, प्रस्तुति का चुटीलापन और भाषा का बांकपन है, इसमें व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा की तटस्थ, निष्पक्ष और पारदर्शी दृष्टि देखी जा सकती है। भीतर-ही-भीतर तिलमिलाने वाले व्यंग्य हैं और सांप भी मर जाए, लाठी भी नहीं टूटे जैसी शैली में। अन्य लोगों पर व्यंग्य करने से पूर्व रचनाकार खुद अपने पर निशाना साधता है। यहां पूरा लेखन व्यष्टि से हट कर समष्टि पर लागू होता संभव हुआ है।
          राजस्थानी में प्रकाशित "कवि-कविता अर घरआळी", "इज्जत में इजाफो" और हिंदी में "दुर्घटना के इर्द-गिर्द", "रफूगिरी का मौसम" पूर्व व्यंग्य संग्रह और हालिया सबूत "चेखव की बंदूक" यानी बुलाकी शर्मा के इक्यावन व्यंग्य जिसे शोर्ट में "बीएस फिफ्टी वन" कहा गया है के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सीधे-सीधे और कभी-कभी उलटे-सीधे ढंग से व्यंग्य  रचना व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा की आदत में शुमार है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आपको "दुर्घटना के इर्द-गिर्द" पैनी दीठ रखने पर राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आज से १६ बरस पहले "कन्हैयालाल सहल" पुरस्कार अर्पित कर हरी झंडी दिखाई गई थी। "इज्जत में इजाफो" होते-होते रह जाना मित्रों की मित्रता है, जिसे आपने हंसते-हंसते झेला और इस दुर्घटना की पीड़ा "बीएस फिफ्टी वन" में यत्र-तत्र कहे सर्वत्र साफ झलती है। बिना पुरस्कार बैकुंठ धाम नहीं जाना और सपनों में भी पुरस्कारों का मायाजाल रचा गया है। यह तो "बीएस फिफ्टी वन" के कलमकार का कमाल है कि पुस्तक में जो दुनिया सामने आती है, उसमें लेखक की बहारी-भीतरी दुनिया के अंधेरों-उजालों को बिना लुकाव-छिपाव के संतुलित रूप में प्रस्तुत किया गया है।
          आप और हम जिस दुनिया में रहते हैं, वह या कहें कि वैसी ही "बीएस फिफ्टी वन" की दुनिया है। रचनाओं की भाषा-शैली के मार्फत हम काफी स्थलों पर उन चेहरों को भी अपने भीतर साकार पाते हैं, जिनका व्यंग्यकार ने नाम लेकर जग-जाहिर नहीं किया है। किसी व्यंग्यकार का इरादा किसी व्यक्ति के स्थान पर उसके गुण-अवगुणों को चिह्नित करना हुआ करता है, और इसी के चलते ये रचनाएं बेशक हमारे अपने आस-पास के लेखकों कवियों की जमात से जुड़ी होकर भी ऐसे अनेकानेक व्यक्तियों समूहों और समुदायों को अपनी जद में लेती हुई प्रतीत होती है। यहां स्थानीयता के विस्तार और उसकी रक्षा में लेखकीय कौशल देख सकते हैं। "बीएस फिफ्टी वन" के निशाने पर जिन प्रमुख स्वनाम धन्य और नए-पुराने साहित्यकारों को रखा गया है उनका नामोल्लेख करना पर्दा हटाने जैसा होगा। लोकार्पण में भी तो किताब को पहले पर्दों में छिपा कर रखते हैं, फिर उसे खोला जाता है। जब लोकार्पण हो ही चुका, तो कहना होगा कि "बीएस फिफ्टी वन" की अनेकानेक दिशाओं में कुछ दिशाएं नंदकिशोर आचार्य, हरदर्शन सहगल, लक्ष्मीनारायण रंगा, मधु आचार्य ‘आशावादी’, राजेंद्र जोशी, नीरज दइया, नवनीत पाण्डे, मालचंद तिवाड़ी, गिरिराज-अनिरुद्ध और खुद बुलाकी शर्मा आदि तक आती-जाती हैं, तो वहीं बीकानेर में होने वाले अनेकानेक आयोजनों की कुछ तश्वीरों का कच्चा चिट्ठा भी यहां खुलता है।

  "बीएस फिफ्टी वन" में अलग-अलग इक्यावन व्यंग्य रचनाओं के होते हुए भी उनमें परस्पर समन्वय और सामंजस्य दिखाई देता है। यहां अफलातून और बजरंगीलाल है तो साथ ही सुखलालजी दुनिया भी है। असल में ये कुछ नाम माध्यम हैं, इसी के बल पर "बीएस फिफ्टी वन" में अनेक चेहरों को बेनकाब किया गया है। ऐसे आदरणीय नाम हमारे बीच है कि जिनके बारे में सीधे-सीधे कुछ कहना अपमान माना जा सकता है। ऐसे सभी स्थलों पर रचनाकार का उद्देश्य सीधा-सीधा उन प्रवृति को "बीएस फिफ्टी वन" से चोटिल करना रहा है, यानी मार कर उस प्रवृति से निजात दिलाना भर रहा है। हमारे आस-पास की दुनिया में हमारे घर-परिवार, मौहल्ले और पेशे के कारण सहकर्मियों के अतिरिक्त लेखन से जुड़ी दुनिया है, और कमोबेश यही दुनिया हम सबकी है। इस दुनिया में बेहद भोला और मासूस-सा सदाचारी जीव जिसे व्यंग्य-लेखक के रूप में पहचाना गया है। "बीएस फिफ्टी वन" के रचनाकार ने बडे जनत से इसे संभाल कर रखा है। यह हर छोटे-बड़े आघात में घायल होने पर भी अपनी मुस्कान बनाए रखने की आदत से पीड़ित है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह अपनी मुस्कान नहीं छोड़ता। काफी जगह तो ऐसा भी हुआ है कि जिस स्थल पर "बीएस फिफ्टी वन" द्वारा अटेक किया जाना है, वहां... हां ठीक वहां.... अलग-अलग वेश बनाकर खुद ही घायल होने की त्रासदी लेखक स्वयं झेलता है। यह महज इसलिए है कि व्यक्ति जहां कहीं भी इन व्यंग्यों में नायक के रूप में गिरता है, वहां वह हारता नहीं है मुस्कुरात हुआ धूल झाड़ता हुआ उठता है, और उन बातों से दूषित मन को स्वच्छ करने का प्रयास करता है।
          यह अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि मैं कहूं कि "बीएस फिफ्टी वन" कोई कोरी किताब जैसे किताब नहीं, वरन एक आइना है। इसमें आप और हम सभी अपना-अपना चेहरा देख सकते हैं। किसी भी व्यंग्यकार की सबसे बड़ी सफलता यही होती है कि उसके द्वारा रचित चरित्रों में हम अपना चेहरा, और अपने आस-पास की दुनिया को पहचान सकें। अलग-अलग भूगोल में इन चेहरों के नाम अलग-अलग रख दिए गए है। चेखव को याद करते हुए उनकी उसी सूरत में हम बीकानेर के बुलाकी शर्मा को देख सकते हैं।

          शीर्षक-व्यंग्य “चेखव की बंदूक” के माध्यम से उन व्यंग्य आलेखों पर चर्चा करना चाहता हूं जिनमें बहुत ही सघे सुर में व्यंग्यकार ने निशाना साधा है। राजस्थानी के प्रख्यात कहानीकर नृसिंहराज पुरोहित कहा करते थे कि व्यंग्य में तो जूते को शॉल में लपेट कर मारा जाता है। बुलाकी शर्मा इसमें भी अव्वल दर्जे के संवेदनशील व्यंग्य लेखक है, जो "बीएस फिफ्टी वन" में आकार-प्रकार के जूतों को बदलते रहते हैं और शॉल को भी।
          एक अंश देखिए : “मैं कथा उस्ताद चेखव से नहीं वरन् उन्हें जब तब ‘कोट’ करते रहने वाले अपने स्थानीय साहित्यिक उस्ताद से आतंकित रहता हूं। चेखव ने जो लिखा, उस पर चलूं अथवा नहीं चलूं, इसका निर्णय करने के लिए मैं स्वतंत्र हूं, क्योंकि चेखव बाध्य करने को उपस्थित नहीं हैं। किंतु स्थानीय उस्ताद की उपस्थिति हर जगह-हर समय रहती है और उनकी यही उपस्थिति मुझे आतंकित बनाए रखती है। उनका आतंक मुझ पर इस कदर हावी है कि नई रचना लिखते समय भी मुझे उनकी उपस्थिति का अहसास बना रहता है।”
          यहां भाषा की सहजता में उस्ताद की स्थानीयता पर जिस बल का प्रयोग हुआ है वह देखते ही बनता है। सूक्त वाक्य चेखव ने कहानी के लिए दिया तो उस वाक्य को सभी विधाओं पर लागू करने का द्वंद्व यहां है। ऐसे ही एक स्थानीय उस्ताद ने फेसबुक पर अर्ज किया कि बंदूक चलनी भी चाहिए। मेरा मानना है कि "बीएस फिफ्टी वन" के रचनाकार बुलाकी शर्मा जिस जमीर पर गोली दागते हैं, वह जमीर भी तो होना आवश्यक है। बिना जमीर के आप और हम उस अहसास को पा ही नहीं सकते कि गोलियां चली है और धना-धन चली है। होली के अवसर पर किसी रंगों की पिचकारी या बंदूक से भले आप कितने ही रंग चलाएं, कोई अंधा बनकर भला उन रंगों का क्या अहसास पा सकेगा! आंखें खोलिए और अपने भीतर के जमीर को जिंदा कर लें यही व्यंग्यकार का उद्देश्य होता है। व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के व्यंग्य वर्तमान समय के आचार-व्यवहार और व्यवस्थाओं को देखते-परखते हुए हमारे जमीर को मांजते हैं, वहीं उसे संवारने और सजाने का स्वपन भी देखते हैं।
-डॉ. नीरज दइया




 
 

Monday, July 13, 2015

कवयित्री रजनी छाबड़ा का एकल काव्य-पाठ

कवयित्री रजनी छाबड़ा के बीकानेर आगमन पर पर्यटन लेखक संघ एवं महफिले अदब की तरफ से रविवार 12-07-2015 को एकल काव्य-पाठ का आयोजन रखा गया, कवयित्री रजनी के आमंत्रण द्वारा मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला।
रजनी छाबड़ा की कविताओं में स्त्री मन की अपने परिवेश और निजी घर-परिवार के साथ संपूर्ण संसार को लेकर जो विभिन्न अनुभूतियां प्रकट होती है उनमें जहां चिंता और चिंतन का भाव है वहीं जीवन को निर्बाध गति से जीने का संदेश भी है। बिना किसी बोझल वैचारिक के उनकी कविताओं में प्रस्तुत सहजता एवं सरलता में उद्धाटित सच निसंदेह हमारा ध्यानाकर्षित करता है।

कार्यक्रम के कुछ सजीव क्षण-






Sunday, July 12, 2015

कथारंग एक अभिनव प्रयोग

75 कहानीकार और वे भी केवल बीकानेर जैसे किसी शहर में होना अपने आप में एक अभिनव प्रयोग है। संपादक हरीश बी. शर्मा के "कथारंग" के लिए बहुत-बहुत रंग कि इस सहयात्रा में मैं भी शामिल हूं....

कमरे की साफ-सफाई झाड-फौंछ के सिलसिल में हाथ में एक पुरानी डायरी आ गई है। यह संयोग ही है कि जो पृष्ठ मेरे सामने खुला है, उस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द। आगे के पृष्ठ पर एक फूल का अधूरा-सा चित्र बनाने की गई मेरी कोशिश देखते ही हरी हो गई है। पहली पंक्ति- वह उससे आखिरी मुलाकात थी, को पढ़कर एक स्मित भीतर ही भीतर जैसे खिल आई। जैसे कोई पुरानी कहानी जवान हो गई हो। कुछ क्षण पहले सब कुछ सामान्य था, बस पलक झकते ही किसी एक शब्द, चित्र या पंक्ति से बंधा मैं कहां से कहां चला गया।
एक ही बस में हम दोनों एक ही शहर से रवाना हुए थे। उसकी और मेरी मंजिल जुदा-जुदा थी, बस हमारा रास्ता एक था। मेरा शहर उसके रास्ते में आता था। सोचा थोड़ा सफर साथ-साथ रहेगा। मैंने कहा कुछ नहीं बस सोचा था कि यदि वह चाहती तो मेरे यहां रुक सकती थी। आगे दो दिन की छुट्टी थी। उसे या मुझे कोई जल्दी नहीं थी। अब इस पल भी सोचता हूं कि मैंने उससे रुकने का कहा क्यों नहीं। वह रुकती या फिर नहीं रुकती किंतु मुझे कहना तो चाहिए था। पता नहीं रुकने का कहता तो वह रुकती भी या नहीं। कहीं एक डर और संदेह था कि मेरे रुकने का कहने का वह क्या अर्थ लेगी? कोई स्त्री-पुरुष साथ या पास-पास आते ही कहानी जन्म लेती है। कहानी तो कोई भी पास-पास और साथ-साथ आए तो आरंभ होती ही है। हमारे समय में ऐसी मित्रता कठिन है। उसके रुकने का अथवा मेरे इस सोचने का सिरा आप पकड़ कर इस कहानी को कहां से कहां ले जाएंगे। क्या एक इन्सान का दूसरे इन्सान से प्रेम के अतिरिक्ति कोई दूसरा संबंध भी होता है। 
उसकी समय की याद एक खुशबू की तरफ अब भी अपने अहसास को लिए जिंदा है। मैं इतने वर्षों बाद अब तक मैं इसे अपनी प्रेम कहानी की तरह संभाले हुए हूं। आज भी लगता है कि वह जख्म हरा है। पीड़ा नहीं, बस कोई सुखद अहसास है जो किसी हवा के झोंके के साथ आया है। वैसे आप जानते हैं कि वर्तमान में जीते हुए, हमारा अतीत में विचरण कभी सुखद और कभी दुखद होता है। मैं अपना काम करते-करते, क्यों सुखद-दुखद जैसी बातें लेकर आत्म-संवाद करने लगा हूं। अभी काम काफी बाकी है। आपका कभी किसी लेखक के कमरे को देखने का अनुभव रहा होगा तो आप जानते होंगे कि कितनी किताबें, पत्र- पत्रिकाएं और भी ढेर सारी सामग्री रहा करती है लेखकों के कमरों में... कोई जरा-सा कागद या पुर्जा भी बेहद जरूरी होता है। किसी कविता की कोई पंक्ति या फिर कहानी की शुरुआत की कुछ पंक्तियां ना जाने कहां कहां लिखी हुई मिल जाती है। हमारे भीतर बहुत सारे नदी-नाले और खिड़कियां-दरवाजे आदी-आदी हुआ करते हैं, जहां से हम जब चाहे-अनचाहे निकलते हैं, और बस खो जाते हैं।
एक समय में एक जीवन के साथ, समांनतर हम अनेक जीवन जिया करते हैं। करने को तो मैं अब भी अपने कमरे को ठीक-ठाक करने का नाटक कर रहा हूं, किंतु खो गया हूं उस कहानी में। मैंने उससे कहा था कि घर पहुंच कर मिस कॉल जरूर करना, और उसका उस रात मिस कॉल आया भी था। वह अच्छे से अपने घर पहुंच गई और फिर कभी नहीं मिली। जरा-सी कोई बात जीवन में खलबली मचा सकती है। एक कोड वर्ड हो सकता है- मिस कॉल वाली। अतीत की यह छोटी-सी कहानी वर्तमान में अनेक कहानियों को जन्म दे सकती है। पत्नी, बेटे-बेटियां और मेरे मित्र, सब के सब अपनी अपनी नजर से इसका पोस्टमार्टम करेंगे।
सच में ऐसी कहानियां जग-जाहिर नहीं करते। बहुत-सी कहानियां पुरानी होकर भी पुरानी नहीं होती, जैसे- यह प्रेम-कहानी। आप उत्सुक हैं जानने को कि आगे मैं क्या लिखने वाला हूं। हम दोनों किसी एक कार्यशाला के सिलसिले अपने अपने शहरों से रवाना होकर किसी एक शहर में मिले थे। वह देखने में सुंदर और दूसरों से अलग-सी दिखती थी। मेरा उसके प्रति आकर्षण का कारण उसकी सुंदरता या विपरित लिंगी होना नहीं था। हम दोनों के अलग-अलग समूह थे। चाय के वक्त जब मैंने पहली बार उसको देखा और उसकी तरफ देखता रहा, तो इसका कारण उसके हाथ में हिंदी की प्रसिद्ध कथा-पत्रिका का होना था। उसका साहित्य-प्रेम जाहिर हो रहा था। मैं हैरान था कि इस उजाड़ में और हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के आरंभिक दौर को जानने-पहचानने वाले मास्टरों और मास्टरनियों में इक्कीसवी शताब्दी की आधुनिक साहिबा कौन है? मेरा अनुमान ठीक निकला वह कहानी लेखिका थी और उसकी कहानी उस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
अपनी और उसकी कहानी मैं आगे बढ़ाता हूं, किंतु बीच में जो मैंने एक आकलन प्रस्तुत कर दिया है उसके भी स्पष्ट करता चलू। जिससे आपको लगे कि मैं सही हूं। मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं है। वहां मौजूद जमात से यदि सवाल किया जाए कि हिंदी कहानीकार कौन-कौन? तो जबाब होगा- प्रेमचंद। और उनके लिए प्रेमचंद के आगे-पीछे भी प्रेमचंद। जिनकी दुनिया सूर, कबीर, तुलसी से आरंभ होकर पंत, प्रसाद, निराला और महादेवी तक पूरी हो जाती हो, वह भला उस कथा-पत्रिका को क्या जानेंगे। उस पत्रिका के बारे में उससे कुछ मित्रों ने पूछा और उन्हें अफसोस हुआ- अरे यह पत्रिका तो प्रेमचंदजी निकाला करते थे, क्या फिर से निकालने लगे? मैं बिना किसी नाटकीय मुद्रा और व्यंग्य के यह सत्य वचन लिख रहा हूं कि हिंदी साहित्य को पढ़ाने वाले समकालीन साहित्य से पर्याप्त सरोकार नहीं रखते। मैं जानता हूं कि आपको भी इस कहानी की नायिका से सरोकार है, कि कैसे-क्या हुआ?
आपको यह जानना अच्छा लगेगा कि मैं जानता हूं कि आपको पता है- आंखें सेकना क्या होता है। यह दोनों तरफ से होता है। चाय के वक्त एक दृश्य बहुत करीब मेरी आंखों के सामने घटित हो रहा था, जिसमें भाई लोग उस कथा-पत्रिका को ले लेकर उलट-पलट कर अपना ज्ञान आलाप कर रहे थे। मैंने एक काम करने की हिम्मत जुटा ली। अपने थेले में से एक पत्रिका निकाली और उस रुपसी को यह कहते हुए दे दी कि मेरी कहानी छपी है। इस उजड़े चमन में यह चुपके-चुपके कोई फिज़ा थी। आश्चर्य कि वहां हिंदी कहानी में अकहानी का दौर कब तक चलेगा... जैसी आवश्यक बहस गर्म थी, और एक साहब तो कह रहे थे कि हिंदी कहानी में प्रेमचंदजी के बाद कोई ढंग का कहानीकार पैदा ही नहीं हुआ। ठीक उस समय हम एक-दूसरे को देख रहे थे! आज इतने लंबे अंतराल के बाद भी मैं उसी जगह जा कर खड़ा हो गया हूं- उसे देखते हुए। थोड़ी देर बाद ही वह मधुर मुस्कान के साथ पत्रिका मुझे लौटाते हुए आंखों ही आंखों में कुछ कहती है। मैं उसका कहना सुनता हूं। अब वह मित्र-मंडली से संबोधित है- प्रेमचंद के बाद... वाह री अकहानी.... उसकी हंसी भीतर गूंज रही है। इस कहानी का यहां कोई सूत्र कस कर हमे एक दूसरे से अब भी जैसे बांधे हुए है।
क्या मैं अब भी उसकी स्मृति में कहीं हूं या यह कोरी मेरी ही स्मृति है जो उसे अब तक बांधे है। आपको यह जादू जैसा नहीं लगता। हम जिसे बांधे बैठे हैं और उसको इसकी खबर नहीं! संबंधों में ऐसा कुछ बीज जैसा होता है कि वह सपना बुनता है। क्या उसकी स्मृति कोई सपना है, जो जड़े फैलाए मेरे भीतर अब भी जिंदा है। आज वह भले ही मुझे भूल गई हो, किंतु जब किसी सूत्र से उसकी स्मृति विगत के उस बिंदु पर पहुंचेगी तब मैं उसके भीतर किसी दृश्य में उपस्थित हो जाऊंगा। मेरी उस उपस्थिति का मुझे भला कैसे अहसास होगा। मुझे इसकी कोई खबर नहीं होगी। बेखबर हमारा ऐसा होना, असल में होना नहीं चाहिए। हम शादी-सुदा ऐसे आकर्षण में अनचाहे बंध गए। हमारी इस कहानी के लिए हमें प्रेम से मिलता-जुलता कोई शब्द नहीं मिल सकता। अंतस में कोई दृश्य कहां से कहां पहुंच कर जुड़ जाता है! इस समय भीतर जैसे गीत बज रहा है- प्यार को प्यार रहने दो.... कोई नाम ना दो.... । इस अनाम कहानी का कोई नाम नहीं, फिर भी एक नाम है। घर-परिवार की आत्मीय बातों, किस्सों-कहानियों में जो संबंध का सिरा बना और विकसित हुआ, वह हमारी आखिरी मुलाकात में कहीं पीछे छूट गया। नहीं ऐसा नहीं हुआ, उसका कोई अंश अब भी भीतर बच है। जो कि अब भी लहरा रहा है। उसका लहराना या रोकना मेरे बस में नहीं।
मैंने एक बार सोचा भी था कि हमारी उस मुलाकात पर एक कहानी लिख कर प्रकाशनार्थ भिजवा दूं। किंतु नहीं लिख सका। सोचता हूं कि हमारा मन क्या किसी कागद की तरह होता है कि उस पर कभी कोई पेपरवेट रख दे, और वह हवा में फड़फड़ाता रहे। ऐसा प्रम जो कभी आकार लेता संभव होता दिखता है, उसे दिखाया कैसे जाए? और क्यों दिखाया जाए? दिखने से दूर सदा छुपा कर रखने वाला प्रेम हमे जिंदा रखता है। भले ऐसे प्रेम पर किसी को यकीन हो या नहीं, किसी के यकीन की आवश्यकता भी नहीं। यह है तो बस है। इस प्रेम को अपना नाम नहीं दिया जा सकता, इसलिए उस पृष्ठ पर मैंने उस दिन लिखा था- प्रेम से मिलता जुलता कोई शब्द ... फूल का वह अधूरा-सा चित्र बनाया था, जो अब भी कभी-कभार महक उठता है। बस मेरे लिए, जैसे आज अभी-अभी सजीव हो गया हो।



 कथारंग पर पाठक पीठ कार्यक्रम में कवि-संपादक हरीश बी. शर्मा के साथ 
09-08-2015 जन्मदिन की बधाई देने के बाद का एक चित्र

Monday, July 06, 2015

श्री बुलाकीदास "बावरा" के तीन नव सृजन-सौपान

    
  मंच पर उपस्थित माननीय श्री मानिकचंदजी सुराणा, श्री भवानीशंकरजी शर्मा, श्री जनार्दनजी कल्ला, डॉ. सत्यप्रकाशजी आचार्य, गुरुदेव श्री भवानीशंकरजी व्यास ‘विनोद’, परमआदरणीया सत्याजी और आप सभी उपस्थित सम्मानित-समुदाय। सर्वप्रथम मैं हमारे जनकवि श्री बुलाकीदासजी ‘बावरा’ के 80वें जन्म दिवस पर उनको और उनके पूरे सामाजिक-साहित्यिक परिवार को बधाई व मंगलकामाएं अर्पित करता हूं। बेहद हर्ष का विषय है कि हरदिल अज़ीज जनकवि बावरा साहब की तीन काव्य-कृतियों का विमोचन आज गरिमामय मंच द्वारा हुआ। मुक्ति संस्था के सचिव श्री राजेंद्र जोशी का आभार कि मुझे आज के अवसर पर पत्रवाचन का अवसर दिया, साथ ही मित्र श्री संजय पुरोहित का आभार।
      विगत तीन वर्षों में प्रतिवर्ष जनकवि बावरा साहब की एक-एक पुस्तकें प्रकाशित होती रही, और यह कार्यक्रम आज होना संभव हुआ है। किसी कवि-लेखक के जीवन में किताब का प्रकाशन एक सपने के संभव होने जैसा है। मुझे खुशी है कि मेरे मित्र संजय ने बहुत बड़ा सपना पूरा किया है। यह सपना केवल हमारे जनकवि श्री बावराजी का नहीं, वरन पूरे बीकानेर और पूरे प्रदेश का है। इस काम का महत्त्व मैं अपने व्यक्तिगत कारणों से कुछ अधिक समझने का भरोसा रखता हूं। मैं स्मरण करना चाहता हूं बावरा साहब के अजीज मित्र और मेरे पिता श्री सांवर दइया का, जिनके नहीं रहने के पर मैंने तीन कृतियों का ऐसा ही लोकार्पण वर्षों पहले करवाया था... मैं मानता हूं कि पिता के प्रति यह और वह कार्यक्रम अथाह प्रेम का प्रतीक है। यह हमारी श्रद्धा है कि ऐसा कर हम स्वयं के साहित्यिक संस्कार पोषित कर रहे हैं। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि मैं कहूं कि आज लोकार्पित तीन-काव्य कृतियां ऐसा प्रसाद है, जो मां सरस्वति के श्री चरणों में एक पुत्र द्वारा पिता के लिए अर्पित किया जा रहा है। यह निरी भावुकता नहीं है। यह भावना की बात है और भावना के आगे तो भगवान भी विवश हो जाते हैं। आज की हमारी बात ऐसे ही आरंभ होनी चाहिए थी, मैं चाहूंगा कि इस पूरे भावनामय कार्य के लिए हमारे युवा कवि-कहानीकार मित्र संजय पुरोहित के लिए जोरदार तालियां कि उन्होंने हमारे जनकवि बुलाकीदास ‘बवरा’ की रचनाओं को पुस्तकाकार संजोया। 
      इस भूमिका के बाद अब मैं विधिवत अपनी बात पर आता हूं। जनकवि श्री बुलाकीदास बावराका विस्तार से परिचय बड़े भाई कहानीकार-व्यंग्यकार श्री बुलाकी शर्मा ने दिया, उनकी कही बातों को वापस नहीं कहूंगा। शब्दों की कतरनप्रकाशन वर्ष 2012, ‘अरदास’ प्रकाशन वर्ष 2013  और ‘माटी की मिल्लत’ प्रकाशन वर्ष 2014 में संकलित विभिन्न काव्य-रचनाओं की बात करते समय मेरे समक्ष एक बहुत बड़ा संकट और चुनौती है। संकट इस रूप में कि इन पुस्तकों में संकलित रचनाओं के रचनाकाल के संबंध में कोई सूचना नहीं है। चुनौती इस रूप में कि मैं जिस कवि के विषय में बात कर रहा हूं वे मेरे लिए मेरे पिता जितने आदरणीय और पूज्य है। मैं स्वयं उनके मित्र-कवि की रचना हूं और अपने रचनाकार पिता के साथी-कवि पर बात करने का अधिकारिक विद्वान होने का भ्रम नहीं पाल सकता। अस्तु मैं जो कुछ भी कह रहा हूं अथवा कहूंगा वह बस ऐसा समझा जाए कि जैसे कोई शिशु डगमगाते कदमों से चलना आरंभ करे और उसके पारिवारिक जन एकदम मौन रहते हुए उसके इस साहस में उसके साथ-साथ स्वयं भी हर्षित-प्रफुल्लित हों।
      किसी भी रचना के मूल्यांकन में समय का घटक महत्त्वपूर्ण होता है। वर्ष 2005 में प्रकाशित अपने कविता संग्रह ‘अपने आस-पास’ संग्रह में बावराजी ने लिखा है- "इस संग्रह की कविताओं में मेरे काव्य जीवन की पचास वर्षों की बानगियां हैं।" इसी संदर्भ को विस्तार देते हुए कहा जा सकता है कि आज विमोचित तीनों काव्य संग्रहों की कविताओं को हम साठ वर्षों की बानगियां मान सकते हैं। मैं एक ऐसे कवि की साधना की बात कर रहा हूं, जिनको कविता लिखते हुए साठ वर्ष हो चुके। मंचीय कविता की शान रहे बावराजी की साधना को प्रणाम करते हुए यह निवेदन करना चाहता हूं कि अपनी पूरी काव्य-यात्रा में जिस काव्य-विवेक का परिचय इन रचनाओं में आरंभ से अंत तक मिलता है, वह जीवनानुभवों के ऐसे धरातल पर आलोकित है जहां जीवन के प्रति गहन अनुराग है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि बावराजी की कविता में जीवन के हर राग को सुर में साधने का हुनर और हर संभव प्रयास देखा-समझा जा सकता है। कवि-आलोचक डॉ. नन्दकिशोर आचार्य के शब्दों में- "बावरा के काव्य-संघर्ष की सार्थकता इस बात में है कि उन्होंने प्रारंभ से ही कवि-सम्मेलनों के मंच पर भी वाचिक कविता का स्वथ्य स्वरूप ही प्रस्तुत किया और सस्ती वाहवाही के लोभ में अपनी कविता के साहित्यिक स्वरों को दब जाने नहीं दिया।"
      डॉ. आचार्य कविता के जिन साहित्यिक स्वरों का संकेत करते हैं उनका समेकित आकलन करना हो तो हमें कवि बुलाकीदास बावरा के पूरे रचना-संसार को कालखंडों में देखना होगा। हिंदी कविता के विविध बदलते आयामों के बीच समय-समय पर अनेक परिवर्तनों को लक्षित किया जा सकता है और हमारी सहज जिज्ञासा यह भी हो सकती है कि आज की इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता-यात्रा में, इन कविताओं को जो विभिन्न दौरों में रची गई हैं को कहां रखा जाएगा? बेशक बावराजी की इस काव्य-यात्रा में हिंदी साहित्य की वर्तमान कविता-यात्रा के साथ चलने का आग्रह नहीं है। महत्त्वपूर्ण यह है कि इन कविताओं का अपना एक अलग इतिहास है और यह हमारे जनकवि श्री बुलाकीदास बावरा री पूरी कहानी है। कहानी इस अर्थ में कि अपनी जिन कविताओं के बल पर कवि बावराजी ने अपना जो मुकाम हासिल किया, ये कविताएं उसी यात्रा को पुखता, प्रमाणित और सघन करती है। आपकी साधना में इन तीनों संग्रहों द्वारा कुछ नए रंग भी जुड़ते हैं।
      ‘शब्दों की कतरन’ में 69 काव्य रचनाएं संकलित है। शीर्षक कविता को देखें- "मैंने / मेरी / शब्दों की कतरन का / कागजनुमा नाविक / तुम्हें / इसलिए नहीं सौंपा / कि तुम उसे / किसी प्रदर्शनी में / रखने की बजाय / पानी में / फैंक दो / यह देखने के लिए / कि वह / तैर सकता है / या कि नहीं।" यह कविता बहुत कम शब्दों में जहां काव्य-सत्य का उद्घाटन करती है, वहीं हमारी गरिमामय हिंदी काव्य-परंपरा से भी जुड़ती है। मैं बिहारी को स्मरण कर सकता हूं- करि फुलेल को आचमन मीठो कहत सराहि / रे गंधी मतिमंद तू इतर दिखावत काँहि। कागज पर कविता कविता के गहरे अर्थ और संदर्भ हुआ करते हैं। कवि की अपेक्षा होती है कि वह जिस भाव को संप्रेषित करना चहता है उस तक पाठक पहुंचे। शब्दों की कतरन की कविताओं में कवि बावरा का मन जिस सहजता सरलता से प्रस्तुत हुआ है उसमें कविता जैसे कवि की हमसफर है। कविता जीवन से जुड़े अनेकानेक सत्यों को प्रकट करती हुई कठोर यथार्थ को स्पर्श करती है। कवि के शब्दों में- "कविता ने स्वतंत्रता से मुझे अंतस की बातें बताने का नैसर्गिक आनंद प्रदान किया है। जीवन के जीवंत संघर्ष का निरूपण करती हुई कविता चिंतन की लंबी घाटियों से गुजर कर मानव समाज के लिए शाश्वत मूल्य उपस्थित करती है और यही मानवीयता की विरासत बनती है।"
      यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कवि बावरा के यहां परंपागत काव्य-शास्त्र के नियमों का पालन उनके अब तक प्रकाशित लगभग सभी संग्रहों में इस रूप में देखा जा सकता है कि कविता संग्रह के आरंभ में ईश-वंदना का निर्बाध पालन हुआ है। शब्दों की कतरन काव्य संग्रह की पहली कविता "ऐ मां मुझको वाणी दे" में कवि बाबराजी लिखते हैं- चलता रहूं निरंतरता में / अपनी राहों को खोजूं / मुझे आलौकित ज्ञानामृत दे / सदा उसे ही पूजूं / तुझमें श्रद्धा रहे सदा ही / वैसी मुझे निशानी दे / ऐ मां मुझको वाणी दे.... कवि का यह विनीत आग्रह है। यहां यह भी साझा करना चाहता हूं कि जोश और खरोश के जीवट और जींवत कवि बावरा की कविताएं जहां जनवाद और प्रगतिवाद के धुव्रों को स्पर्श करती है वहीं भक्ति में डूबी ऐसी रस-धार भी उपस्थित करती है जिसे सर्वथा पृथक रूप में जाना-पहचाना जाएगा। मैं बात कर रहा हूं कविता संग्रह ‘अरदास’ की, जिसमें 34 काव्य-सुमन है जो विभिन्न देवी-देवताओं को सादर समर्पित है। प्रथम-पूज्य श्रीगणेश वंदना से आरंभ हुए इस काव्य संग्रह अरदास में जिस सहजता, सरलता और विनित भाव से ईश-वंदना के स्वरों को संजोने का महती कार्य हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह काव्य-साधना का दूसरा छोर है जिस पर पहुंच कर कवि उस परम तत्त्व को सुरों से साधना चाहता है। इन काव्य रचनाओं और अन्य गीतों के संबंध में मैं यह भी निवेदन करना चाहता हूं कि इनमें छिपी ऊर्जा और ओज का सही-सही रूपांकन होगा यदि इन भजनों और गीतों को सुर अर संगीत से जोड़ दिया जाए। इन संग्रहों की तथा अनेक अन्य ऐसी रचनाएं बावरा साहब के सजृन-लोक में हमें मिलती है कि उनका आस्वाद करते हुए लगता है कि यदि इनको सुरों और संगीत में पिरोया जाए तो सृजन की सार्थकता होगी।
      असल में हमारे जनकवि श्री बुलाकीदास ‘बावरा’ की काव्य-साधन स्वातः-सुखाय रही है जिसमें कवि का धेय कविता द्वारा स्वयं को पाना है। ‘स्व’ की तलाश करती ये कविताएं विभिन्न सौपानों को पार करती हुई आज जिस रूप में हमारे सामने है, उसमें एक राजस्थानी कविता संग्रह और आठ हिंदी काविता संग्रह का होना अपने आप में बहुत बड़ा काम है। इस काम का महत्त्व इस अर्थ में और अधिक बढ़ जाता है जब कि कवि ने अपनी पूरी जिंदगी अपने असूलों पर जीना स्वीकारा और आनंदपूर्वक स्वाभिमान से जीवन जीया है।
      संग्रह ‘माटी की मिल्लत’ में कवि बावराजी के 125 मुक्तक और 61 गीतिकाएं व गजलें संकलित हैं। मुक्तकों में जहां छंद का निर्वाह हुआ है वहीं अंतर्मन की विभिन्न अवस्थाओं में अनेकानेक रंग-रूप देखे जा सकते हैं।
      बावराजी के शब्दों में ही कहना चाहता हूं- तुमने मुझे संवारा है / तुमने मुझे दुलारा है / बंद हुई सब आवाजें / तुमने मुझे पुकारा है।
      ये रात अपनी है / ये बात अपनी है / दुनिया जले तो जलने दो / मुलाकात अपनी है।
      जीवन की इस पुस्तक के मैं पृष्ठ उलटता जाता हूं। /    निहित सभी अध्यायों के भी अर्थ लगाता जाता हूं। / खोकर के जो भी पाया है उसकी रक्षा के खातिर, /       लुट जाने से पहले सारे वहम मिटाता जाता हूं।
      आज सांध्य दैनिक "विनायक" के संपादक दीपचंद सांखला ने अपने संपादकीय में लिखा है- "आठवें दशक में आपातकाल के दौर को छोड़ दें तो तब शहर में कवि सम्मेलनों में व्यवस्था विरोध की वाणी मुखर थी। जनकवि हरीश भादानी, शायर मस्तान के साथ सरकारी सेवा में होने के बावजूद जो कवि बेधड़क थे उनमें भीम पांडिया, बुलाकीदास 'बावरा', व लालचन्द भावुक के नाम प्रमुख रहे। ऐसों की ही कविताओं के माध्यम से व्यवस्था विरोध के भाव का पोषण होता रहा है।"
      कवि श्री बुलाकीदास बावरा की इस काव्य-यात्रा में हमें गीत, गजल, मुक्तक और छंद मुक्त कविताएं मिलती हैं, जिनमें अनेक काव्य-प्रयोग है। काव्य-भाषा में हिंदी के साथ उर्दू का सुंदर प्रयोग किया गया है। अरदास जैसा संग्रह तो बावराजी को सगुण भक्त कवियों की श्रेणी में ले जाता है। हम इन संग्रहों और बवराजी की समग्र काव्य-यात्रा पर आगे विभिन्न अवसरों पर चर्चा करेंगे। आज बस इतना ही और अंत में इन पुस्तकों के सुंदर प्रकाशन के लिए अणिमा प्रकाशन, बीकानेर को साधुवाद। धन्यवाद।
- नीरज दइया
(दिनांक 06-07-2015 को विमोचन समारोह में प्रस्तुत किया गया पत्र)





Sunday, July 05, 2015

"मौन से बतकही" का वास्तविक सच

“मौन से बतकही” (2014) राजेंद्र जोशी का दूसरा कविता संग्रह है। “सब के साथ मिल जाएगा” (2011) कविता-संग्रह से अपनी काव्य-यात्रा आरंभ करने वाले जोशी के इन दोनों संग्रहों के बीच तीन वर्ष अंतराल का है, इसे लंबा अंतराल नहीं कहा जा सकता। “मौन से बतकही” में आमुख लेखक की पहली पंक्ति पर ध्यान चाहूंगा- “जाने-माने सामाजिक कार्यकर्त्ता और साक्षरताकर्मी श्री राजेंद्र जोशी लंबे अंतराल से कविताएं भी लिखते रहे हैं।” क्या यहां व्यंजना यह है कि जोशी बहुत लंबे समय से कविताएं भी लिखते रहे हैं, और उनका प्रकाशन नहीं हुआ है। संभवतः ऐसा नहीं है, यह एक संकेत है। मुझे उल्लेखित पंक्ति का पद “भी” अनुचित जान पड़ता है। चूंकी यहां लंबे अंतराल पद को सद्भावना पूर्वक व्यवस्थित नहीं किया गया है। यदि ऐसा होता तो आगे कि पंक्तियों में कविताओं को लेकर गहरे संदेह प्रस्तुत नहीं किए जाते। इस पहली पंक्ति के आरंभिक पद पर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि किसी सामाजिक कार्यकर्त्ता और साक्षरताकर्मी द्वारा कविता लिखी जानी चाहिए अथवा नहीं इस दुविधा पर भी यहां प्रश्न उठता है। साथ ही यह प्रतिप्रश्न भी जाग्रत होता है कि कवि का रोजगार-कार्य भी कविता के मूल्यांकन हेतु महत्त्वपूर्ण होता है? मेरा विश्वास है कि किसी रचना की परख का आधार केवल उसका पाठ ही होना चाहिए। हिंदी साहित्य में कभी सामाजिक कार्यकर्त्ताओं की अथवा साक्षरताकर्मियों की कविताओं की चर्चा होगी तब इन कविताओं को उस समूह में विवेचित किया जाएगा, फिलहाल मेरा अनुरोध है कि श्री राजेंद्र जोशी को केवल और केवल हिंदी के कवि के रूप में स्वीकारते हुए लिखित कविता-पाठ को प्रमुख समझा जाए।
आमुख लेखक का पूर्वाग्रह तीसरी पंक्ति में व्यंजित हुआ है- “जाहिर है, जोशी के यहां अपने कवि-कर्म को लेकर कोई बड़बोला दावा अथवा कोई दुर्विनित आग्रह नहीं है।“ ऐसा दावा जाहिर करवाने का यह मार्ग यहां ऐसे सुलभ हो जाता है, जिसकी कोई आवश्यकता नहीं। ऐसा उद्देश्य होने अथवा न होने से, कविता का पाठ कहीं प्रभावित नहीं होता? पाठक के लिए यह एक भटकाव अवश्य होता है। यहां मेरा प्रतिप्रश्न है कि ऐसा दावा अथवा आग्रह किस युग की परंपरा रही है, अथवा ऐसा व्यक्तिगत स्वभाव भी भला किस कवि का देखा और पहचाना गया है। कवि-विवेक की पहली अनिवार्य शर्त है कि हर दावे और प्रत्येक आग्रह को खारिज कर दिया जाए। यह किसी रचना के पाठ को पूर्वग्रह पूर्वक अस्वीकार करना है। संभवतः इसी का प्रमाण है कि श्री राजेंद्र जोशी की कविताएं आमुख लेखक को छद्म-कविताएं प्रतीत होती है। कविता की परख में उसके भेस को देखना केवल उसका बाहरी रूप देखना है।
आमुख की चौथी पंक्ति उल्लेख करना चहूंगा- “उनके (यानी श्री राजेंद्र जोशी के) संवेदनशील मन की प्रतीतियां अपना रूपाकार खोजती हुई कागज पर उतरती हैं तो स्वाभाविक सी कुछ लय-संरचनाएं भाषा में निबद्ध होकर कविता का भेस धारण कर लेती है।“ अर्थात ये कविताएं केवल भेस में दिखाई देती है और है नहीं। क्या भेस धारण करना बुरा है? यदि स्वाभाविक सी कुछ लय-संरचनाएं भाषा में निबद्ध होकर कविता का भेस धारण कर लेती है, तो क्या केवल भेस पर ही ठहर जाना है। भेस होने के उपरांत भी अगर कोई काव्य-भाषा के मर्म तक नहीं पहुंचे तो भेस अनावश्यक है। कविता केवल भेस घारण करने से संभव नहीं होती। प्रश्न यह भी है कि क्या कविता का उसके भेस में बने रहने से होना संभव होता है, अथवा भेस में पहचाना जाना प्रतिकूलता के सांचे की तरह है कि लौट चलिए यहां वास्तविक कविता नहीं मिलेगी।
वास्तविक और अवास्तविक कविता क्या होती है? भेस कहते ही असली और नकली जैसे पद साथ चले आते है। सीधे प्रश्न पर आते हैं कि कविता कैसे बनती हैं? वह कौनसी आंख होती हैं कि कुछ पंक्तियों को कविता के रूप में स्वीकारा जाता है और कुछ को अस्वीकारा जाता है। कवि द्वारा रचे जाने के उपरांत पारखी नजर भेस को पहचान लेती हैं, या फिर यह भेस स्वतः सर्वसुलभ गोचर होता है। मित्रो ! कविता का होना अथबा नहीं होना उसके भेस पर निर्भर नहीं है। जब कोई कवि अपने मन की प्रतीतियों को भाषा में प्रस्फुटित करता है, तो कविता की तमाम शर्ते वह जानता है। किसी अनुभव का काव्य में रूपांतरण भाषा संभव करती है। कविता की समझ और भाषा की शक्ति जिनके द्वारा पोषित होती है, उनमें काव्यानुवाद प्रमुख है। यहां उल्लेखनीय है कि राजेंद्र जोशी समर्थ अनुवादक हैं। राजस्थानी और हिंदी भाषा में आपका सुदीर्घ विधिवत अध्ययन, मनन और चिंतन रहा है। इसी जुड़ाव के चलते आपने राजस्थानी से हिंदी में सराहनीय काव्यानुवाद किया जो साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ है।
फेस-बुक के मित्र परिचित हैं कि स्वाभाविक सी कुछ लय-संरचनाएं भाषा में निबद्ध करते हुए राजेंद्र जोशी प्रतिदिन कुछ पंक्तियां कविता के भेस में प्रस्तुत करते हैं। क्या यह काव्य-कौशल को विकसित करने का उनका प्रतिदिन का रियाज है। कविता में अभ्यास की आवश्यकता अपने पक्ष को और उन्नत करने का उपक्रम मानी जा सकती है। कुछ ऊंची उडानें भरने की आपकी प्रगाढ़ अभिलाषा है। किसी शब्द का पद के रूप में किसी पंक्ति में आना, और उस पंक्ति में उस पद के द्वारा कविता संभव करना, असल में कवि-हृदय ही संभव करता है। बोलचाल की भाषा से साहित्य का प्रगाढ संबंध रहता है। साहित्यिक भाषा बोलना अथवा सामान्य भाषा बोलना, सभी रूप भाषा के ही उपांग और विविध घटक कहे जाते हैं। जो कुछ भी सामान्य-सा घटित घटना-क्रम है वह भी साहित्य की किसी विधा का कोई अंश अथवा अवयव हो सकता है। हो सकता से भी आगे बढ़कर लिखा जाना चाहिए कि ऐसा होता है। कविता को जीवन से विलगित नहीं किया जा सकता। कुछ प्रसंग रचे जाते हैं, कुछ छूट जाते हैं। जो कुछ रचा जाता है अथवा छूट जाता है... वह पूर्वाग्रहों के चलते धुंधलके में चला जाता है। रचना के पाठ में उतरने से पहले उसके विषय में कहे गए पूर्व-कथनों को अलग कर दिया जाना चाहिए।  
इसे कोई साहित्यिक प्रवचन नहीं माने, मैं कविता संग्रह “मौन से बतकही” के बहाने कविता को लेकर अपनी कुछ बुनियादी जिज्ञासाएं साझा कर रहा हूं। जीवन की व्यापकता पर ही कविता और साहित्य की हर विधा आश्रित है। वह भाषा ही है जो अलग-अलग विधाओं के भेस सौंपती है। क्या यह रूपगत पहचान विधा के लिए अवरोध है? आश्चर्य है कि रूपगत पहचान संदेह का कारण है। आमुख लेखक ने संग्रह की कविताओं में स्वाभिवता को उनकी शक्ति और सीमा दोनों कहा है। आखिर राजेंद्र जोशी की इन कविताओं में ऐसा क्या विरोधाभाष है कि अपनी भाषिक संरचना में सरल और निष्कपट-सी लय संरचनाओं में सामाजिक सरोकारों से सराबोर कविताओं को एक साथ दो विपरीत धुव्रों पर रखने का आग्रह है। क्या यह सिद्धांत है कि कोई नया कवि सदैव विधा को और उन्नत करने और ऊंची उड़ाने भरने की आशीषों का आकांक्षी ही होता है? शक्ति भी है और सीमा भी है, अर्थात कुछ कहने में कुछ नहीं कहना है। अथवा कहने के उपरांत कहना स्थगित रखा जाना है।
मैं कुछ सीधे-सीधे कहने-सुनने के बीहड़ जंगल में पहुंच सकूं, इसके लिए जरूरी है कि कवि राजेंद्र जोशी और मेरी अंतरंगता भी यहां जाहिर करता हूं। आरंभ में यह अंतरंगता मुझे रोकती-टोकती रही। कवि का या आयोजकों का कोई आग्रह नहीं था, मैं सीधे-सीधे यह तथ्य प्रस्तुत करना चाहता हूं कि जिस सीमा और संभावाना के दो छोर के बीच किसी कवि को रखा जाता है वह असमंजस की स्थिति है। स्थिति को ठीक-ठीक नहीं पहचान सकने की स्थिति है। यह कहना बेहद खतरनाक है कि राजेंद्र जोशी की कविताएं स्वयं ऐसी चुनौती प्रस्तुत करती हैं कि मैं अपने तमाम काव्य-विवेक जो जितना भी और जिस किसी मात्रा में है अथवा जिसके होने के भ्रम का असहास भी है अगर, तो उस के रहते भी किसी निष्कर्ष तक पहुंचना कठिन है। यह सीधे-सीधे कहने का साहस है कि मेरी अपेक्षाओं को राजेंद्र जोशी पूरित नहीं करते, किंतु वर्तमान में जो ऊर्जा यहां प्रस्तुत हुई है वह बेहद आशा जगाती है।
संग्रह “मौन से बतकही” की कविताओं पर चर्चा से पूर्व संग्रह की शीर्षक-कविता देखें- आओ बातें करें / पेड़ों से / पत्तों के / मौन से / थोड़ा सहज होकर X X X X  कितने सीधे / अनुशासित / अहिंसक / पूरी सृष्टि में / बिना अहंकार के / जन्म-मरण में साथ निभाते / प्राण देते हमें / आओ इनके मौन से / बतियायें !
अनुभव का यह रूपांतरण जिसे कविता के भेस में प्रस्तुत किया गया है के साथ विमर्श के अनेक मार्ग है। आलोचना का गणित यह है कि दो अनुबंधों की यह कविता पांच और नौ पंक्तियों में व्यवस्थित है। इसके पहले अनुबंध में कवि आदेशात्मक मुद्रा में अपने पाठक को जो विनम्रता पूर्वक ही सही किंतु आदेशित कर रहा है, जो काव्यानुभव नहीं है। पंक्तियों पर फिर से ध्यान दिलाना चाहता हूं- आओ बातें करें / पेड़ों से / पत्तों के / मौन से / थोड़ा सहज होकर ... इसके उपरांत दूसरे अनुबंध में कवि का विमर्श पेड़ और पत्तों के विषय में भौतिक ज्ञान है, जो अनुभव द्वारा पोषित है। किंतु कविता की अंतिम पंक्ति के रूप में प्रयुक्त पद- बतियायें के पश्चात विस्मयादि बोधक चिह्न का रखा जाना क्या है? क्या पूरी सृष्टि में पेड़ों के अतिरिक्त कोई सीधा, अनुशासित और अहिंसक नहीं है? पेड़ का बिना अहंकार के जन्म-मरण में साथ निभाना और प्राण देना क्या है? कविता हमें इन प्रश्नों तक ले जाती है। पेड़ों का प्राण देना और कवि का विमर्श कि इनके मौन से बतियाया जाए। वह जो भाषा से हमें प्राप्त हो रहा है उससे हम कुछ ऐसे कर्म को प्रेरित हो सकें। आओ इनके मौन से बतियायें में विस्मयादि बोधक असल में कविता और कवि का पाठक को संबोधन भी कहा जा सकता है। यह भी हो सकता है कि अब तक हमारे इस मौन को नहीं समझे जाने पर यह आश्चर्य हो। संभवतः यह उसी का संकेत हो। कविता जिस मौन की तरफ संकेत कहती है, वह अव्यक्त है और व्यक्त होने को आतुरता से प्रतिक्षारत है। इस मौन में समाहित भाषा को पहचाने का यह कवि का आह्वान ही कविता है। व्यापकता से पेड़ और पत्तों से दूर पूरे पर्यावरण के मौन को ग्रहण किया जा सकता है। फिराक़ साहब का स्मरण करना चाहूंगा- तारे आंखें झपकावें हैं, ज़र्रा-ज़र्रा सोयो हैं। / तुम भी सुनो हो यारो शब में सन्नाटे कुछ बोलें हैं। फिराक साहब ने जिस सन्नाटे को सुनने का आगाज किया, वह कवि की परंपरा है और उसी परंपरा में सन्नाटे के छंद अज्ञेय जी की कविता उल्लेखनीय है, और उसी काव्य-भूमि पर राजेंद्र जोशी का यह संवाद-आह्वान है।
एक अन्य महत्त्वपूर्ण कविता है- “खोजना अपने होने को”, इसे संग्रह के अंतिम आवरण पृष्ठ पर भी रखा गया है। देखें- कब मिलेगी आजादी / थिरकन है तुम्हारे पांवों में / और ऊर्जा देह में / शिथिल नहीं हो / संभलकर चलती हो / कहीं सच यह तो नहीं / कि तुम आजादी चाहती ही नहीं / जकड़ी जा चुकी हो / मेरी बेड़ियों में / मुझे पता है / तुम बंधनों को / अपनेपन में बदल चुकी हो / इसमें भी शायद / खोज लेती हो / अपने होने को।
स्त्री विर्मश को नए संदर्भों में प्रस्तुत करती यह कविता राजेंद्र जोशी के विशद और व्यापक अनवेष्ण का परिणाम है। यहां प्रचलित विमर्श के समक्ष नवीन और एकाकी धारणा का प्रस्तुतिकरण सीधे संवाद के रूप में हुआ है। पहले जिस अबोले पेड़ के मौन को चिह्नित किया गया था, उसी क्रम में यहां स्त्री के मौन को सुनने-समझने की प्रबल आकांक्षा व्यंजित हुई है। यहां विचार नहीं वरन अनुभव प्रमुख है। हमारे इस बीकानेर राजस्थान परिक्षेत्र में स्त्री को अबोली भी कहा जाता है। वह बोलती नहीं, उसकी मुखरता धूंघट से बाहर नहीं आई। आज के युग में जिसे स्त्री-विमर्श की संज्ञा से पहचाना जा रहा है, उसी के समक्ष यह कविता अनेकाने प्रश्नों का अंबार प्रस्तुत करने की विकलता दर्शाती है। क्या ऐसे सीधे और सटीक काव्य-विमर्श के बाद भी राजेंद्र जोशी को हम संभावनाओं और सीमाओं के दो ध्रुवों के बीच गतिशील प्रस्तुत करना चाहेंगे अथवा यह कह सकते हैं कि यह कविता संभावनों के नए क्षितिजों को खोलती ही नहीं, वरन हमें उन तक ले जाने का साहस भी रखती है। जहां हम मौन को सुनने को सुलभ हो जाएं। यह सामाजिक यथार्थहमारे बेहद नजदीक पहुंच कर मर्म को छूता है।
“मौन से बतकही” संग्रह के तीन खंड़ों में 72 कविताएं हैं। इन तीनों खंडों की कविताओं के केंद्रीय स्वर की बात करें तो यहां प्रेम और मानवीय संबंधों के इर्द-गिर्द स्त्री को नए नजरिये से पहचानने अथवा कहें उसके यथार्थ को बुनने का हौसला नजर आता है। राजेंद्र जोशी की कविताओं के संदर्भ में कवि प्रेमचंद गांधी ने लिखा है- “समाज और परिवार के बीच दाम्पत्य और प्रेम को मजूबत रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में काव्यानुभव में बदल देने वाली ये कविताएं निरंतर अमानवीय होते जा रहे समय में मनुष्यता और मानवीय प्रेम का एक वितान रचती हैं।“ मुझे कविताओं के एकाधिक पाठ में कहीं भीतर लगा कि कवि श्री राजेंद्र जोशी के मानस में आदर्श कवि के रूप में कवि डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की कोई छवि है। कुछ विषय व निर्वाहन जिस शिल्प में प्रस्तुत किया गया है, उससे कहीं भीतर अहसास होता है कि श्री जोशी के गुरु द्रोण आचार्य जी हैं। इससे आगे की बात श्री राजेंद्र जोशी उनकी काव्य-यात्रा स्वतः उजागर करेगी। रेखांकित करने योग्य बात यह भी है कि इन कविताओं में किसी कवि की अनुकृति नहीं, बस भाषा में कविता का भेस बनाने का हुनर कहीं कहीं आयतित-सा जान पड़ता है।
संग्रह की कविताओं में विविध विषयों की प्रस्तुतियों में कवि की कथात्मक से सजी अभिधायुक्त पंक्तियों में मार्मिकता और सच्चाई के साथ जहां जीवनानुभव भी तो कहीं-कहीं अनगढ़ माटी-सा रूपाकार लिए कुछ पंक्तियां ऐसी आकृतियां भी गढ़ती हैं, जिन्हें हम किसी बंधे-बंधाए रूप के करीब तो पाते हैं पर आकृति कुछ स्पष्ट नहीं हो पाती। यह मूर्त और अमूर्त के बीच का किसी पुल जैसा है, जहां कोई दृश्य किसी स्मृति के दरवाजे को खोल कर उसके बेहद करीब होने का अहसास दे जाता है। यह भाषा में लुका-छिपी का खेल नहीं है। मैं साफ-साफ देख सकता हूं कि कविताओं की पंक्तियों में कही-कही कुछ शब्दों का क्रम जिस सहजता के चलते प्रस्तुत हुआ है, उसमें कुछ परिवर्तन की संभवाना है। यह संभावना इस लिए भी है कि कविताओं में कहीं-कहीं कुछ शब्दों और पदों से कवि का मोह है, जो बार-बार कविताओं में प्रयुक्त होता है। ऐसे मोहवश कहीं-कहीं तो कुछ पदों की उपस्थिति कविता के पाठ और अर्थ-विस्तार को बाधित करती है।
उदाहरण के लिए हम संग्रह की पहली ही कविता “विरासत” को लेते हैं। यह स्त्री को संबोधित कविता है, जो स्त्री-गाथा प्रस्तुत करने का साहस करती है। साहस इस अर्थ में कि स्त्री पर अब तक बहुत लिखा जा चुका है और साहसी कवि रचनाकार फिर फिर नए रंग-रूप में फिर लिखेंगे। राजेंद्र जोशी की कविता में स्त्री को सूर्य, चंद्रमा और आकाश की विरासत बताया गया है। जिसे अपराधी दुनिया मिटा नहीं सकती। स्त्री धर्म, कर्म, मंदिर, ध्वजा तो है ही, साथ ही नदी, तालाब, पृथ्वी और आकाश भी है, जिसे अग्नि भी जला नहीं सकती। यहां बिम्बों और विचारों की ऐसी भरमार जिसमें स्त्री आकाश होकर भी आकाश की विरासत के रूप में प्रस्तुत की गई है। ऐसा लगता है कि कवि स्त्री को सभी कुछ कहते हुए, जैसे सब कुछ पूरा उडेल देना चाहते हैं। ऐसी ज्ञान से परिपूर्ण कविताओं में संवेदनाओं की कमी और व्यक्तिगत आग्रह-विमर्श अधिक नजर आते हैं।
मुझे इन कविताओं में भाषा और शिल्प की विविधता के रहते उनका केंद्रीय स्वरूप प्रेम और मानवीय संबंधों के इर्द-गिर्द ही नजर आता है। कवि जोशी अपनी भाषा में बेहद सरल और सीधे जान पड़ते हैं, तो कहीं ऐसे भटकाव और उलझने भी हैं कि संदेह होता है कि पीछे कोई अनुगूंच अचेतन में उन्हें खींच रही है। अंत में मेरा यह आग्रह है कि कवि राजेंद्र जोशी अपनी कविता को लेकर दावा मजबूत करेंगे और इस साहस को हासिल करेंगे कि मैं कवि हूं..... । मेरी सुभेच्छा कि हमारे जाने-माने सामाजिक कार्यकर्त्ता और साक्षरताकर्मी श्री राजेंद्र जोशी अपनी रचनात्मकता के बल पर विगत छवि से मुक्त होकर जाने-माने कवि राजेंद्र जोशी कहें जाए।
- नीरज दइया
(दिनांक 05-07-2015 को पाठक-पीठ कार्यक्रम में पठित आलेख)

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