Tuesday, November 24, 2015

साहित्यकार मधु आचार्य एवं डा. नीरज दइया तैस्सीतोरी अवार्ड से सम्मानित

बीकानेर । राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के शोध अध्ययेता इटली विद्वान डा. एल. पी. तैस्सीतोरी की 96 वीं जयन्ती के अवसर पर सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट द्वारा राजकीय संग्रहालय परिसर में तैस्सीतोरी प्रतिमा स्थल पर “वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तैस्सीतोरी के कार्यो की उपादेयता” पर चर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हिन्दी राजस्थानी के साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी एवं डा. नीरज दइया को “तैस्सीतोरी एवार्ड-2015” अर्पित किया गया।

कार्यक्रम के अध्यक्ष बीकानेर पश्चिम के विधायक डा. गोपाल जोशी ने कहा कि डा. एल. पी. तैस्सीतोरी ने इटली से आकर यहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति के शोध का कार्य किया, हमें अपनी मायड भाषा पर गर्व होना चाहिये। उन्होंने कहा कि राजस्थानी को संविधान की 8 वीं अनुसची में मान्यता मिलते ही इसका ज्यादा विस्तार होगा। उन्होंने कहा कि पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ जिस रफतार से किताबें लिख रहे हैं उससे लगता कि पुस्तक सृजन का शतक जल्द पूरा करेंगे। उन्होंने कहा कि डा. दइया अच्छे समालोचक हैं जिनकी सोच सामाजिक है। डा. जोशी ने कहा कि आशावादी एवं दइया को डा. तैस्सीतोरी सम्मान मिलना गरिमामय है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजस्थान राज्य अभिलेखागार के निदेशक डा. महेन्द्र खडगावत ने कहा कि डा. एल. पी. तैस्सीतोरी ने 5 वर्ष तक इस क्षेत्र में खोज की उसकी सर्वे रिपोर्ट अभिलेखागार में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि तैस्सीतोरी ने राजस्थानी गीत भी लिखे। डा. खडगावत ने कहा कि मधुजी और डा. दइया के उर्जावान रचनाकर्म को तैस्सीतोरी की तरह याद रखा जायेगा।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के प्रेमचन्द गांधी ने कहा कि डा. तैस्सीतोरी ने पश्चिम राजस्थान में शोध कार्य किया, उसके प्रमाण पाकिस्तान के पुस्तकालयों में भी मिलते हैं। विशिष्ट अतिथि चेन्नई प्रवासी जमनादास सेवग ने कहा कि पत्रकार मधुजी और आलोचक नीरजजी को यह एवार्ड मिलना गौरवपूर्ण है।

आरंभ में कार्यक्रम के संयोजक एवं कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट की गतिविधियों का विस्तार से परिचय देते हुए वर्तमान एवं भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्था अध्यक्ष डॉ. गोपाल जोशी एवं सचिव डा. मुरारी शर्मा के द्वारा सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीटयूट की गरिमामय परंपरा को सहेजने का महत्त्वपूर्ण कार्य बहुत गंभीरता से किया जा रहा है। संस्था प्रयासरत है कि पत्रिका का फिर से प्रकाशन आरंभ किया जाए तथा प्राचीन पांडुलियों के संरक्षण की भी व्यापक व्यवस्थाएं की जा रही है। सचिव डा. मुरारी शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि कोई भी संस्था अपने सतत कार्यों की वजह से पहचान पाती है और जिसकी पहचान पहले से ही बनी हुई हो उसे बनाए रखने का दायित्व संस्था से जुड़े सभी स्वजनों का होता है।

व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने कहा कि सादुल राजस्थानी इंस्टीटयूट आजादी से पहले से गठित गौरवशाली संस्था है। उन्होंने कहा कि मुझे गत वर्ष तैस्सीतोरी एवार्ड से नवाजा जा चुका है, जिसे मैं अकादमी पुरस्कार से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं। लेखक अशफाक कादरी ने मधु आचार्य ‘आशावादी’ के कृतित्व एवं उपलब्धियों तथा कवि राजाराम स्वर्णकार ने डा. दइया की सृजन यात्रा पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में अतिथियों ने साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी एवं डा. नीरज दइया को शॉल ओढ़ाकर, सम्मानपत्र, स्मृतिचिह्न, पुस्तकें एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में सखा संगम के चन्द्रशेखर जोशी, खुशल चंद रंगा, बृजगोपाल जोशी द्वारा केसर सम्मान अर्पित किया। सम्मान से अभिभूत मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने कहा कि यह एवार्ड मेरे लिए अकादमी एवार्ड से भी बडा है, क्यों कि इस संस्था का इतिहास बहुत प्राचीन और समृद्ध रहा है। इस संस्था से अनेक मूर्धन्य साहित्यकार जुडे रहे है और उनके कार्यों का राजस्थानी साहित्य एवं परंपरा में उल्लेखनीय स्थान है। डा. नीरज दइया ने कहा कि किसी भी सम्मान से लेखक की सामाजिक स्वीकृति का पता चलता है, साथ ही सम्मान से रचनाकार की अपने समाज के प्रति जिम्मेदारी और जबाबदेही बढ़ जाती है। मैं अपने लेखन द्वारा प्रयास करूंगा कि सम्मान देने वाली संस्था और अपने साहित्यिक समाज के निकषों पर निरंतर खरा बना रह सकूं।

डा. बसन्ती हर्ष ने धन्यवाद ज्ञापित किया तथा संचालन कार्यक्रम के संयोजक राजेन्द्र जोशी ने किया। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’, भंवरलाल ‘भ्रमर’, डा. किरण नाहटा, शमीम बीकानेरी, सरदार अली पडिहार, पत्रकार लूणकरण छाजेड, जब्बार बीकाणवी, मोहनलाल मारू, पार्षद प्रेमरतन जोशो, रामदेव दैया, वरिष्ठ चित्रकार मुरली मनोहर के. माथुर, डा. उषाकिरण सोनी, जयचन्दलाल सोनी, डा. अजय जोशी, हाजी मोहम्मद युनुस जोईया, श्रवण कुमार, सुरेश हिन्दुस्तानी, अनिरूद्ध उमट, नवनीत पांडे, हरीश बी शर्मा, प्रशान्त बिस्सा, इरशाद अजीज, अमित गोस्वामी, असित गोस्वामी, महेन्द्र जैन, राकेश कांतिवाल, संदीप पडिहार, चतरा राम, डा. कल्पना शर्मा, बाबूलाल छंगाणी, चन्द्रशेखर आचार्य, नदीम अहमद ‘नदीम’, कवयित्री मोनिका गौड, वली मोहम्मद गौरी, जाकिर अदीब, इसरार हसन कादरी, शशि शर्मा, डा. नमामी शंकर आचार्य, मईनुदीन कोहरी, आत्माराम भाटी, डा. एस. एन. हर्ष, बुनियाद जहीन, प्रमोद चमोली, शमशाद अली, लक्ष्मण मोदी, योगेन्द्र पुरोहित सहित अनेक गणमान्य नागरिक साहित्य प्रेमी शामिल थे।
























Friday, November 20, 2015

सुकून देती नीरज दइया की कविताएं

-विजय शंकर आचार्य

       उचटी हुई नींद के बाद/ जब लगती है आंख/ अटकी रहती हो तुम/ भीतर-बाहर/ जैसे नींद में/ जागते हुए।/ नहीं चलता मेरा कोई बस। मैं नहीं जान ही पाया- कब उचटी नींद/ कब लगी आंख!
       नींद का उचटना सामान्य आदमी के लिए साधारण घटना हो सकती है। संवेदनशील मन इस नींद के उचटने को बहुत अलग ढंग से समझता है और अभिव्यक्त करता है। उचटी हुई नींद कवि, आलोचक डॉ. नीरज दइया का प्रथम हिंदी काव्य संग्रह है। इस दौर में जब कहा जा रहा है कि कविता का युग समाप्त हो चुका है नीरज की कविताएं कुछ हौसला देती नजर आती हैं। साठ कविताओं के इस संग्रह में अंतिम तीन कविताओं में प्रायोगिक रूप में तीन गद्य कविताओं को भी स्थान दिया है।
       नीरज की कविताओं से गुजरते हुए लगता है उनका अपना एक संसार है जो केवल ऐसा सपना भर नहीं जो सिर्फ देख कर भूला जा सके। संग्रह ‘एक सपना’ कविता से प्रारम्भ होता जहां कवि कह देता है- किसी भी उडान के लिए/ एक आंख चाहिए/ और चाहिए, आंख में/ एक सूर्यदर्शी सपना। इस युग में जब चारों ओर सपनों के सौदागर बाजीगरी से सपनों को बेचकर मुनाफाखोर बने हुए हैं। ऐसे में जब सपनों पर पहरे बैठाएं जा रहे हों। ऐसे में जब सपने दिखाकर, सपनों को तोड़ा जा रहा हो तब डॉ. दइया के ‘कुछ सपने और’ आशा जगाते हुए आह्वान करते नजर आते हैं- घुट-घुट कर मरने से बेहतर हैं जिए कुछ देर और... / भूल जाएं सब कुछ, चले कुछ आगे और..../ किसी आकाश का बनकर बादल बरसें कुछ देर और.../ आंसुओं को पोछ कर चुनें जिंदा कुछ सपने और....
       किसी भी रचना का पाठ करते हुए यदि पाठक अपनी संवेदनाओं में गमन करते हुए कवि की संवेदनाओं का हमसफर बन जाए तो रचना की सफलता ही कही जा सकती है। इस संग्रह को पढ़ते हुए यदि पाठक के साथ ऐसा होता है कोई अतिश्योक्ति नहिं है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक उनके साथ बतियाने लगता है। वह प्रेम के लोक में विचरण करने लगता है और प्रेममय हो जाता है। खोखली होती जिन्दगी में प्रेम के मरने के इस दौर में जब पाठक अपनी खोखली हंसी के बीच डॉ. दइया की ‘खोखली हंसी’ में प्रवेश करता है उसे अपने अंतस तक पैठे खोखलेपन से दो-चार होना पड़ता है- प्रेम के बिना/ नहीं खिलते फूल/ कुछ भी नहीं खिलता/ ... जो खिलता हुआ उसके पीछे प्रेम है/ जहां नहीं प्रेम/ वहां सुनता हूं- खोखली हंसी।
       इस भयावह, क्रूर उठापटक वाले स्वार्थपरक युग में जब प्रेम ‘ढूंढते रह जाओगे’ की सीमा तक आ चुका है। ऐसे जलते उबलते परिवेश में कवि का प्रेम को ढूंढना और उसे बचाए रखने की जद्दोजहद में अपनी नींद को उचटा देना साधारण प्रेम के बूते की बात नहीं है। इन कविताओं को प्रेम कविता कहना शायद इसलिए उचित नहीं होगा क्योंकि बदलते युग में प्रेम के मायने बदल गए हैं। नीरज की कविताओं के प्रेम में जमाने की हवा की स्थूलता नहीं है एक गहराई जिसे जानने के लिए अनुभूति के गहनतम अंतस तक पैठना जरूरी हो जाता है।
       आज के इस युग में जब मानवीयता सिर्फ समाचारों की सुर्खियां बटोरने के लिए सप्रयास की जाती है, जब हमारी स्मृतियों को खत्म करने के लिए साजिशें की जा रही हैं। ऐसे में कवि अपनी स्मृति को सहेज कर रखना चाहता है और कह देता है तुम्हारी स्मृति में हैं/ कई गीत/ उन में से चुनकर एक/ गा रही हो तुम/ कहा तुमने/ आवाज पर मत जाना/ स्मृति पर जाना/ क्या गीत के सहारे/ पहुंच सकूंगा मैं/ तुम्हारी स्मृति तक?
       सामान्यतः लोग अपने संग्रह का शीर्षक संग्रह में प्रकाशित किसी एक कविता के शीर्षक को रख देते हैं। लेकिन डॉ. नीरज ने यहां एक प्रयोग किया है। उनके कविता संग्रह में ‘उचटी हुई नींद’ नाम की कविता नहीं है। लेकिन कवि का गद्य कविता का प्रयोग कम असरकारक रहा। गद्य कविताएं पहले की कविताओं की तुलना में कम प्रभाव छोड़ती हैं।
       कुल मिलाकर नीरज की कविता दैहिक और आलोकिक प्रेम की उस सीमा पर खड़ी है जहां पाठक अपनी अन्तरावस्था से जहां भी पहुंचना चाहे वहां जा सकता है। इन कविताओं की खास बात इनका सीधापन है। इनमें लय है जो पाठक को कविता दर कविता आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। डॉ. नीरज की कहीं कृत्रिमता नजर नहीं आती। आज के इस कृत्रिम युग में कविताएं सुकून देती हैं।
संयुक्त निदेशक (कार्मिक)
माध्यमिक शिक्षा राजस्थान, बीकानेर

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उचटी हुई नींद (कविता संग्रह) ; कवि - डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर ; संस्करण : 2013 ; पृष्ठ संख्या : 80 ; मूल्य : 60/-
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(शिविरा, नवम्बर 2015 में प्रकाशित)

Wednesday, November 18, 2015

डॉ. नीरज दइया की आलोचना-दृष्टि और सृष्टि

भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
आलोचना  बौद्धिक प्रकृति का साहित्यिक-सांस्कृतिक कर्म है अतः आलोचक का नैतिक दायित्व बनता है कि वह किसी कृति की विषद व्याख्या और तात्विक मूल्यांकन करते हुए उसमें व्याप्त बोध की अभिव्यक्ति और उसके निहितार्थ को समाने लाए। उसका यह भी दायित्व है कि वह आज के जटिल समय में किसी कृति की समग्रता को इस प्रकार प्रस्तुत करे कि पाठक की समझ का विकास हो और वह बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिक बोझ के रचना का आस्वाद ले सके। काल के अनंत प्रवाह में कृति की अवस्थिति की पहचान ही आलोचना है।
          सही दृष्टि वाले आलोचक के मन में कुछ प्रश्न हमेशा कुलबुलाते रहते हैं। जैसे आलोचक के इस अराजक और अविश्वसनीय युग में वह कैसे अपनी तर्क बुद्धि और विवेक का उपयोग करे? निरपेक्ष तथा तटस्थ किस प्रकार रहे? सच कहने व किसी रचना के कमजोर पक्षों को उघाड़ने का साहस कैसे करे? और परंपरा एवं निरंतरता के बीच समीकरण कैसे बिठाए? ये कुछ बुनियादी प्रश्न हैं जिनसे पूर्वाग्रह रहित आलोचक का भिड़ना होता रहता है। आलोचना की परंपरा में दो नाम निर्विवादित रूप से उभर कर आते हैं। इनमें पहला नाम है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का तथा दूसरा है डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का। आचार्य शुक्ल कृति को केन्द्र में रखकर मूल्यांकन करते थे। वे कृतिकार से चाहे वह कितना ही दिग्गज क्यों न हो, प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय दिया करते थे।
          उधर डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी कृति को तो केन्द्र में रखते थे पर रचना में निहित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक संदर्भों में भी सहज रूप से संचर्ण करने में नहीं हिचकिचाते थे। संचरण के बाद वे कृति पर फिर से उसी प्रकार लौट आते थे जैसे कोई संगीतज्ञ लम्बे आलाप के बाद सम पर लौट आता है। इन दोनों दृष्टियों में आलोचना के जो गुणधर्म सामने आते हैं वे इस प्रकार हैं- कृति घनिष्ठता, आस्वाद क्षमता, संवेदनशीलता और प्रमाणिकता। इसके अलावा एक प्रकार का खुलापन, चारों ओर से आने वाले, चिन्तन का स्वागत, प्रस्तुति का पैनापन तथा पक्षधरता के स्थान पर पारदर्शिता का प्रदर्शन आदि भी स्वास्थ आलोचना के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
          मेरे सामने डॉ. नीरज दइया की आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉ. दइया ने दोनों प्रणालियों से जुड़े इन आठों बिन्दुओं का मनोयोग से पालन किया है। आचार्य शुक्ल और डॉ. द्विवेदी के युग के अस्सी वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी साहित्य में आलोचना के मानक साहित्य शास्त्र का अब तक विकास नहीं हुआ है फिर राजस्थानी कहानी-आलोचना तो वैसे ही रक्त अल्पता का शिकार है तथा पक्षधरता से अभिशप्त रही है। ऐसे में यदि स्वस्थ व निरपेक्ष दृष्टि की कोई आलोचना पुस्तक सामने आए तो उसका स्वागत किया ही जाना चाहिए।
          आलोचना का प्रस्थान बिंदु है साहस। डॉ. दइया ने साहस के साथ कहानी-साहित्य को कथा साहित्य कहने का विरोध किया है क्यों कि कथा शब्द में कहानी व उपन्यास दोनों का समावेश होता है (केवल कहानी का नहीं)। उसे कथा शब्द से संबोधित करना भ्रम पैदा करता है। साथ ही उन्होंने केवल परिवर्तन के नाम पर उपन्यास को नवल कथा कहने की प्रवृति का भी विरोध किया है क्यों कि इस अनावश्यक बदलाव की क्या आवश्यकता है?
          व्यक्तियों के नाम से काल निर्धारण करने की प्रवृति को भी वे ठीक नहीं मानते क्योंकि ऐसा करने से आपधापी, निजी पसंद-नापसंद, आपसी पक्षधरता और हासलपाई लगाने के प्रयास आलोचना के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं। डॉ. दइया यह मानकर चलते हैं कि आधुनिक होने का अर्थ समय के यथार्थ से जुड़ना है। ‘बिना हासलपाई’ पुस्तक की एक विशेषता उसकी तार्कितकता और तथ्यात्मकता का है। पच्चीस कहानीकारों में नृसिंह राज्पुरोहित को प्रथम स्थान इसलिए दिया गया क्योंकि उनकी कहानियों में पूर्ववर्ती लोक कथाओं से सर्वथा मुक्ति का भाव है अतः सही मायने में वे ही आधुनिक राजस्थानी कहानी के सूत्रधार माने जा सकते हैं। राजस्थानी कहानी के विकास में कुल जमा साठ वर्ष ही तो हुए हैं। इस अवधि में शुरुआती पीढ़ी से आज तक की नवीनतम पीढ़ी तक चार प्रवृतियां तथा चार पीढ़ियां सामने आती हैं। इसे दृष्टिगत रखते हुए डॉ. दइया ने 15-15 वर्षों के चार कालखण्डों के विभाजन का सुझाव दिया है ताकि चारों पीढ़ियों तथा चारों प्रवृत्तियों के साथ न्याय किया जा सके।
          कहानीकारों का चयन संपादक का विशेषाधिकार हुआ करता है। डॉ. दइया ने 25 कहानीकारों की कृतियों को सामने रखकर सारा ताना-बाना बुना है। उसमें ऐसे अनेक कहानीकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है जो पक्षधरता या फिर ग्लैमर या कि प्रचार के कारण सभी संकलनों में समाविष्ट होते रहते हैं। पुस्तक में ऐसे स्वनामधन्य, रचनाकारों के विरुद्ध कोई टिप्पणी तो नहीं है पर उनके वर्चस्व के चलते ऐसे उपेक्षित या हल्के-फुल्के ढंग से विवेचित किन्तु उनके समान ही या कहीं-कहीं सृजनात्मक रूप से उनसे भी आगे रहने लायक कुछ कहानीकारों को पूरे सम्मान के साथ जोड़ा गया है। क्या कारण है कि सर्वथा समर्थ और प्रभावशाली कहानीकार भंवरलाल ‘भ्रमर’ के साथ समुचित न्याय नहीं किया गया? क्या कारण है कि प्रथम पीढ़ी के साथ कहानियां लिखने वाले मोहन आलोक को या कन्हैयालाल भाटी को उपेक्षिता रखा गया? चौकड़ी की धमा चौकड़ी के चलते ऐसे कई समर्थ कहानीकार प्रकाश में नहीं आ सके जिनकी कहानियां वर्षों से पत्रिकाओं में छपती रहती थी। चूंकि पुस्तक रूप में उनके संग्रह बाद में सामने आए, क्या यही उपेक्षा का वजनदार कारण बन सकता है? संपादक को तो चौतरफा दृष्टि रखनी चाहिए। पत्रिकाओं के प्रकाशन, गोष्ठियों में कहानी-वाचन, सेमिनारों में कहानियों पर चर्चा आदि पर भी सजग संपादकों द्वारा ध्यान दिया जाना चाहिए। पुस्तक रूप में सामने आने न आने पर क्या गुलेरी जी की कहानियों के अवदान को कम आंका जा सकता है? डॉ. दइया ‘आ रे म्हारा समपमपाट, म्हैं थनै चाटूं थूं म्हनै चाट’ वाली प्रवृति के एकदम खिलाफ हैं।
          इस पुस्तक की एक और विशेषता संपादक की अध्ययनशीलता की है। उन्होंने कुल 25 कहानीकारों के 55 कहानी-संग्रहों की 150 से अधिक कहानियों की चर्चा की है और वह भी विषद चर्चा। मुझे तो इससे पूर्ववर्ती संकलनों में ऐसा श्रम साध्य काम को करता हुआ कोई भी आलोचक नहीं मिला। कसावट भी इस पुस्तक एक अद्भुत विशेषता है। पृष्ठ संख्या 31 से पृष्ठ संख्या 160 तक के 130 पृष्ठों में सभी 25 कहानीकारों की कहानियों के गुण-धर्म का विवेचन करना और अनावश्यक विस्तार से बचे रहना कोई कम महत्त्व की बात नहीं है। तीसरी और चौथी पीढ़ी के उपलब्धीमूलक सृजन तथा आगे की संभावनाओं को देखते कुछ ऐसे कहानीकारों को भी शामिल किया गया है जिनको पूर्ववर्ती संकलनों में स्थान नहीं मिला।
          डॉ. दइया के पास एक आलोचना दृष्टि है तथा कसावट के साथ बात कहने का हुनर भी है। वे कलावादी आलोचना, मार्क्सवादी आलोचना या भाषाई आलोचना के चक्कर में न पड़ कर किसी कृति का तथ्यों के आधार पर कहाणीकार के समग्र अवदान को रेखांकित करते चलते हैं। ऐसा विमर्श, ऐसा जटिल प्रयास कम से कम सुविधाभोगी संपादक तो कर ही नहीं सकते। रचना के सचा को उजागर करने में हमें निर्मल वर्मा की इस टिप्पणी पर ध्यान देना होगा कि ‘आज जिनके पास शब्द है, उनके पास सच नहीं है और जिनके पास अपने भीषण, असहनीय, अनुभवों का सच है, शब्दों पर उनका कोई अधिकार नहीं है।’ मुझे यह लिखते हुए हर्ष होता है कि डॉ. दइया के पास वांछित शब्द और सच दोनों ही है। डॉ. दइया ने सभी कहानीकारों के प्रति सम्यक दृष्टि रखी है, न तो ठाकुरसुहाती की है और न जानबूझ कर किसी के महत्त्व को कम करने की चेष्टा ही की है। एक और बात- प्रथम और द्वितीय पीढ़ी के कहानीकारों की चर्चा करते समय उसी कालखंड में लिखने वाले अन्य कहानीकारों की कहानियों के संदर्भ भी दिए गए हैं ताकि तुलनात्मक अध्ययन संभव हो सके।
          डॉ. दइया ने वरिष्ठ कहानीकारों की कहानियों में जहां कहीं कमियां दर्शाई गई है वहीं इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया गया है कि शालीनता व सम्मान में किसी प्रकार की कमी न रहे। संक्षेप में यह आलोचना पुस्तक एक अच्छी प्रमाणिक और उपयोगी संदर्भ पुस्तक है। मैं इसका हृदय से स्वागत करता हूं।     

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पुस्तक : बिना हासलपाई ; लेखक : डॉ. नीरज दइया ; प्रकाशक : सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर ; संस्करण : 2014 ; पृष्ठ संख्या : 160 ; मूल्य : 240/-
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(शिविरा : नवम्बर, 2015 से साभार)

Friday, November 13, 2015

राजस्थानी कहाणी संग्रै 'अगाड़ी' (राजेंद्र जोशी)



पत्र वाचन / डॉ. नीरज दइया

     
      राजस्थानी कहाणी विकास जातरा मांय बीकानेर सदा सूं अगाड़ी रैयो है। अठै रा कहाणीकारां रो पूरी परंपरा में खास रुतबो रैयो। मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’ सूं लेय’र राजेन्द्र जोशी तांई री कहाणी जातरा मांय केई-केई मुकाम निजर आवै। कहाणी नै कीरत देवणियां कहाणीकारां मांय सर्वश्री श्रीलाल नथमल जोशी, यादवेंद्र शर्मा ‘चन्द्र’, अन्नाराम ‘सुदामा’, मूलचंद ‘प्राणेश’, सांवर दइया, भंवर लाल ‘भ्रमर’, बुलाकी शर्मा, श्रीलाल जोशी, मदन सैनी, मधु आचार्य ‘आशावादी’, नवनीत पाण्डे आद केई नांव गिणाया जाय सकै। हरख री बात कै गद्यकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’, मूलचंद ‘प्राणेश’ अर सांवर दइया नै तो साहित्य अकादेमी सम्मान कहाणी-संग्रै माथै मिल्यो। बीकानेर सूं पैली कहाणी पत्रिका ‘मरवण’ निकळी, तो उल्लेखजोग संपादित कहाणी-संग्रै ‘उकरास’ ई बीकानेर री देन मान्यो जावै। इणी ओळ मांय ‘कथा-रंग’ नै गिणां तो बीकानेर कहाणी लेखन रो मोटो गढ कैयो जाय सकै। आ खासियत अठै री धरती री रैयी कै आधुनिक कहाणी नै लोककथा रै साम्हीं ऊभी करणियां कहाणीकार अठै जमलिया। आ जे कोई खरोखरी जाणकारी चावै कै लोककथा अर सामंती व्यवस्था सूं आधुनिक कहाणी अर आज रो समाज कियां बण्यो, तो उण नै बीकानेर रै काहणीकारां री कहाणियां बांचणी चाइजै। राजेन्द्र जोशी आपरै पैलै कहाणी संग्रै ‘अगाड़ी’ रै मारफत कहाणी विकास-जातरा मांय जुड़ै।
      आज लोकार्पण-उछब री बेळा आपां आ कामना करां कै ‘अगाड़ी’ रो कहाणीकार कहाणी विकास जातरा मांय ई अगाड़ी रैवै। जठै आगूंच लांठी परंपरा रैयी हुवै, उण मांय अगाड़ी बणणो, साव सौरो काम कोनी। पण आ जरूर है कै आज जिका अगाड़ी कैया जावै बां एक पूरी जातरा पछै ओ मुकाम हासिल करियो है। कैय सकां कै इण मुकाम खातर राजेन्द्र जोशी आपरै कहाणी संग्रै ‘अगाड़ी’ सूं सरुवात करी है। किणी रचनाकार नै किणी विधा मांय कीं लिखण सूं पैली खुद सूं ओ सवाल करणो चाइजै कै म्हैं क्यूं लिखूं? अठै कहाणी री बात करां तो सीधो सवाल ओ कै कोई कहाणी क्यूं लिखै? कांई कहाणी रै मारफत कहाणीकार खुद नै रचिया करै। किणी कहाणीकार नै जद दूजां री कहाणियां बिचाळै, खुद री कहाणी न्यारी लखावै तद बो कहाणी लिखण री सोचै। कहाणी लिखण री सोचण अर कहाणी लिखणी दोय न्यारी न्यारी बात हुवै। बियां आगूंच सोच’र कोई कहाणी कदैई लिखीजी कोनी, कहाणी तो खुद रचीजै। कहाणी रै मारफत कहाणीकार खुद नै सिरजै। सिरजक तो दोय लांठा मानीजै- एक अदीठ ऊपर बैठो आपां रो सिरजक कहाणियां रचै। जिकी कहाणियां आपां देखां-सुणा-भोगा। दूजो- कोई रचनाकार जिको कहाणी रचण री हूंस पाळै।
      कहाणीकार फगत खुद रै भोग्योड़ै साच नै ई कहाणियां मांय नीं ढाळै, बो देखी-सुणी-समझी केई-केई कहाणियां अर कीं गोड़ा-घड़ी कहाणियां नै ई साव साच दांई कहाणी मांय रचण नै खपै। कहाणी साच नै घड़ण री खिमता राखै। अठै सवाल ओ है कै आपां किणी कहाणी में कांई जोवां- कोई कोई साच जोवां का किणी कूड़ री उडीक करां? म्हैं कहाणी मांय बदळतै बगत रा रंग जोवूं, बदरंग हुवती जूण री जातरा रा रंग जोवूं, जीवण रो मरम समझण री हूंस जोवूं अर हरेक कहाणी नै उण री पूरी परंपरा में जोवूं कै इण मांय नवो कांई है? राजेन्द्र जोशी री कहाणियां माथै विगतवार बात करां, उण सूं पैली कैवणी चावूं कै अगाड़ी री कहाणियां आपां री परंपरा नै पोखणवाळी कहाणियां है।
      संग्रै री पैली कहाणी “अगाड़ी” जिण माथै संग्रै रो नांव राख्यो है, पैली ओळी है- “अबै कित्ता’क दिनां री बात है मा’जी देवउठणी इग्यारस सूं मौरत तो निकळणो ई है।” कहाणी मांय आ ओळी बतावै कै आज रै जुग मांय संस्कारां अर संस्कृति री संभाळ करणियां लोग आपां रै समाज मांय है। आ पण हुय सकै कै खुद कहाणीकार इणी विचारधारा रो हुवै। का इण ढाळै री बातां समाज मांय बो पोखणी चावै। हुय तो आ ई सकै कै कहाणीकार आं बातां सूं समाज नै दूर राखणो चावै। नवै जुग मांय लेय’र जावण रो सोच ई हुय सकै, जठै देव अर इग्यारस सूं जूण मुगत रैवै। म्हैं कहाणीकार राजेन्द्र जोशी नै बरसां सूं जाणूं। अठै म्हैं बां री घरू का कोई निजू मनगत रो खुलासो नीं करणो चावूं। बात उण कहाणीकार री है जिको अगाड़ी री कहाणियां लिखी। आलोचना नै रचनाकार सूं मुगत हुय’र फगत इण बात सूं सरोकार राखणो चाइजै कै कहाणियां में कांई लिख्यो है। किणी पण कहाणी मांय उण री हरेक ओळी अर हरेक सबद जिण सूं बा ओळी रचीजै, लिखती बेळा भेळो एक अरथ रचीजै। आपां जाणां कै किणी एक ओळी सूं कहाणी मांय कोई पूरो अरथ कोनी बणै। आलोचना उण पूरै अरथ तांई पूगण रा जतन करै।
      पूरी कहाणी री बात करां तो मूळ मांय अगाड़ी कहाणी घणै जूनै विसय दायजै माथै लिख्योड़ी नवी कहाणी है। नवी इण अरथ मांय कै आज रै जुग मुजब कहाणी दायजो नीं लेवण रो सीख सीखावै। कहाणीकार राजेन्द्र जोशी री खासियत अर सावचेती कै बै कहाणी रचती बेळा किणी पाठ दांई कोई पाठ नीं पढावै। कहाणी में कुल च्यार पात्र मिलै। एक पात्र कपिल री मा नै ई गिण सकां। पण खास पात्र है- बाप-बेटो अर सासू-बहू। सुमेर आपरै बेटै रो ब्यांव बिना दायजै करण री मनगत आपरी लुगाई नै आ सोच’र नीं बतावै कै बा मानैला का नीं मानैला। आ बात बेटो अर बाप दोया दोय तांई राखै, पण इसी बातां कद तांई लुकाया लुकै। कहाणी मांय च्यार पात्रां रै मारफत तीन पीढियां साम्हीं आवै। मुसकल पुराणी पीढी सूं हुवणी है, क्यूं कै बा देव अर ग्यारस सूं जुड़ी पीढी है। दायजो नीं लेवण री बात आज ई झट देणी मानणै मांय कोनी आवै। पण घरधणी अर बेटै री भावनावां नै समझती अगाड़ी री नायिका ई सेवट बां भेळै रळ जावै। आ बीचली कड़ी है जिण मांय पैली अर तीजी पीढी नै जोड़ण अर जोड़िया राखण री जिम्मेदारी समझ सकां। अबखाई आ कै बींद री दादी मतलब जूनी पीढी नै कुण समझावै, तद अगाड़ी बणै घर री बींनणी मतलब बींद री मा।
      कहाणीकार री सफलता है कै पूरी कहाणी मांय स्सौ कीं अगाड़ी हुवता थकां ई कहाणी रो मरम छेकड़ री ओळ्यां मांय उजागर हुवै। एक पीढी साम्हीं दूजी अर तीजी पीढी रै रळ’र अगाड़ी हुवण री आ कहाणी है। असल मांय अगाड़ी कहाणी एक घर-परिवार नै नीं पूरै समाज नै अगाड़ी लावण री कहाणी है। राजेन्द्र जोशी री इण कहाणी री खासियत आ कै इण काहणी मांय समस्या फगत दायजै री तो संकेत रूप मांय कहाणीकार उठावै, असल मांय बो पूरै सामाजिक सोच नै बदळ’र नवै सोच नै बिड़दावण रो मोटो काम आपरी इण कहाणी मांय करै।
      इत्ता चावळिया पछै कीं बात रावळियां री, इण कहाणी री कीं खासियतां बिचाळै लखावै कै कहाणीकार नै कहाणी कैवण रो कोड ई रैयो, अर हरखायो-कोड़ायो एक-दो जागा चेखव री बंदूक तो दिखावै, पण गोळी आगै कठैई छूटै कोनी। दाखलै रूप बात करां तो ‘अगाड़ी’ कहाणी री पांचवी ओळी देखां- ‘तीजै नंबर आळै बेटै री बीनणी मा’जी नै नैहचो बंधावती-बंधावती बां रा पग दाबावण लागी।’ इण ओळी मांय माइतां री सेवा तो ठीक है, पण सुमेर पेटै तीजै नंबर आळी जाणकारी चेखव री बंदूक है, जिकी कहाणी मांय आगै कठैई काम कोनी आवै। सवाल ओ है कै कांई कोई तीजै नंबर रो बेटो साचाणी अगाड़ी बण्यो अर राजेन्द्र जोशी उण रै सांच नै अंगेजता थका आ कहाणी रची। कहाणीकार साची घटना माथै कहाणी रचै तद किणी खिण एक बो क्यूं बिसर जावै कै आ साची घटना कोनी कूडी-साची कहाणी है। कहाणी मांय हरेक दाखलै पेटै सावचेती री दरकार हुया करै। सावचेती आ कै राजेन्द्र जोशी री काहणियां मांय कहाणी कैवण रो भाव कीं बेसी मिलै।  
      असल मांय कहाणी आपरै कैवण रो ओ भाव लोककथा सूं अंगेजती आवै। आधुनिक कहाणी मांय बेसी कैवण री जागा, अबै सांकेतिकता अर सूक्ष्मता रै भाव नै लेय’र कहाणी आगै बधती दीसै। आपां कहाणी परंपरा रो दूजो मोटो गुण का दोस “संजोग” नै मान सकां। असल मांय संजोग खुद मांय कोई गुण का दोस कोनी, अर सरु सूं लेय’र आज तांई री पूरी कहाणी खुद संजोग कैयी जाय सकै। हरेक घटना खुदोखुद मांय एक संजोग हुया करै। जियां आज ओ संजोग कै राजेन्द्र जोशी रै कहाणी संग्रै रो लोकार्पण अर आपां रै मिलण रो संजोग। इणी खातर कैयो कै खुद संजोग कोई बाण-कुबाण कोनी। मोटी बात आ हुवै कै कोई संजोग कहाणी में कहाणीकार किण ढाळै रचै। कहाणीकार संजोग नै रचती वेळा साच रै भेस मांय रचण री खिमता राखै।
      आपां संग्रै री दूजी कहाणी ‘अबै माफी नीं’ में संजोग रै रचाव नै देख सकां। कहाणी री बात सूं पैली कहाणियां रै सिरैनांवां री बात करां तो कैवणो पड़ैला कै संग्रै ‘अगाड़ी’ री केई कहाणियां रा सिरै नांव राखण मांय घणी सावचेती निजर आवै। ‘अबै माफी नीं’ तीन सबदां सूं रचीज्यो। इण सिरै नांव नै बांचता हियै उमाव जागै कै किण बात री माफी नीं? कांई आ ओळी कहाणी मांय कोई पात्र बंतळ करता बोलै। इण नै बोलण रै भाव मांय ई कहाणी हुय सकै। एक सौरै सांस बोलां- अबै माफी नीं, दूजो रीस मांय बोला- अबै माफी नीं, कोई ओळी कियां बोलीजी इण सूं कहाणी मांय घणो फरक पड़ै। अबै माफी नीं रो अरथाव देखां- पैला किणी बगत कोई माफी मिली अर अबै नीं? जद पैला माफी मिली तो अबै क्यूं नी? कांई पैली जिकी माफी मिली बा वाजिब ही या कोनी ही। एक सिरैनांव सूं बांचणियां री मनगत मांय केई-केई सवाल-जबाब जुड़ जाया करै।
      कहाणीकार राजेन्द्र जोशी री कहाणी ‘अबै माफी नीं’ में तीन पात्र है। इण कहाणी बाबत कीं कैवण सूं पैली कैवणी चावूं कै कहाणीकार आपरी काहणियां मांय साव कमती पात्रां रै मारफत सरल, सहज अर सरस कहाणियां रचै। आं कहाणियां री सगळा सूं मोटी खासियत आं री पठनीयता मानी जावैला। राजेन्द्र जोशी सफल गद्यकार रूप आपरी कहाणियां नै पढावण री खूबी राखै, अर एक बात भळै कै आं कहाणियां मांय केई अंस अर भाव बांचणियां रै चेतै मांय घर कर लेवण री खूबी ई राखै।
      चावा-ठावा कहाणीकार बुलाकी शर्मा संग्रै अगाड़ी रै फ्लैप माथै लिख्यो है- “अगाड़ी री कहाणियां सूं राजेन्द्र जोशी री ओळखाण लुगाई मन रै साचै चितैरै कहाणीकार रूप हुवैला। आं कहाणियां मांय आज री लुगाई री केई-केई छवियां मिलै, जिण में खूबियां-खामियां दरसावती ऐ आपरी ओळख-आपो संभाळती-संवारती आधुनिक हुवती दीसै।”
      ‘अबै माफी नीं’ मा अर बेटी राधा रै ठगीजण री कहाणी है। आ ठगी दोनां साथै जिको आदमी करै बो एक ई आदमी है। बो आदमी मिनख कोनी, आदमी रै भेस मांय जिनावर है। ओ जिनावर मोटो अफसर है। जिको लुगायां नै न्यारै-न्यारै ढंग सूं ठगै। इण रै चकारियै जिको चढै, बो बचै कोनी। ओ ठगण रा नवा नवा तरीका जाणै। जिकी घटना कहाणी मांय मा साथै घटै, बा सागण पाछी जद बेटी साथै घटण नै आवै तद संजोग सूं बिचाळै मा आवै अर नवा-जुना सगळा बदळा काढ लेवै।
      कहाणी री छेकड़ली ओळ्यां बानगी रूप देखां-
      - “चाल थाणै चालां।” बा राधा नैं कैयो।
      - “रैवण दे नीं मा...।” राधा मा नैं समझावण लागी, “बो कीं गड़बड़ नीं कर सक्यो... थूं सांतरी जंतराई कर दीनी...। थाणै चालणो रैवण दे मा...। लोग धिंगाणै ई बात रो बतंगड़ बणासी।”
      - “ना... ना।” बीं रै सुर मांय दृढता ही, “इसै राखसां री ठौड़ जेळ ई है। जिको लुगाई साथै दगो करै, उण री आबरू लूटणी चावै, बीं नै कदैई माफ कोनी करूं।... चाल थाणै, आपां रपट लिखावां।” राधा रो बांवड़ियो पकड़्यां बा थाणै कानी जावै ही।
      राजेन्द्र जोशी कहाणी संग्रै रो नांव अगाड़ी इण खातर राख्यो हुवैल कै समाज मांय अबै हरेक नै आप आप री जागा बदळाव खातर अगाड़ी आवणो पड़ैला। कहाणी ‘अबै माफी नीं’ मांय सेवट लोगां रै धिंगाणै बात रो बतंगड़ बणावण री परवा छोड़’र राधा री मा अगाड़ी आवण रो फैसलो लेवै, इण नै आपां मोटी सफलता मान सकां, काहणी ओ संकेत करै कै आबै आगै आवै। अगाड़ी हुयां ई काम सरैला।
      इणी कथ्य रै जोड़ रो कथ्य पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ आपरी कहाणी ‘ओढणियो’ में बरतै। दोनूं कहाणियां न्यारी-न्यारी जमीन माथै ऊभी है, एक गांव री कहाणी है तो एक शहर री। गांव अर शहर दोनूं जगावां लुगाई-जात नै आपरो आपो संभाळण री बात दोनूं कहाणीकार करै। एक मोटो फरक आ दोनूं कहाणियां मांय सूक्ष्मता अर स्थूलता रो है। पूर्ण शर्मा ‘पूरण’ बेसी सांकेकिता में आपरी बात कैवै, जद कै राजेन्द्र जोशी कहाणी ‘अबै माफी नीं’ मांय स्थूलता बरतै।
      कहाणी ठीमर सुर में आ बात मांड’र कैवै कै कोई आदमी किणी लुगाई नै कियां आपरै जाळ मांय लेवै। कहाणी मांय पेंट रो जिकर एक तरकीब रूप आवै। म्हारो मानणो है कै जे आप आ पेंट-तरकीब-गाथा आंख्यां मांय सूं काढ लेवो तो इण पेंट-प्रकरण नै भूल कोनी सको। कहाणी मांय पेंट राधा री भोळी मा री टांग्यां मांय फसै अर बा चकारी चढ जावै। कैयो जावणो चाइजै कै राजेन्द्र जोशी जिकी पेंट सबदां रै मारफत कहाणी मांय बरतै बा बांचणियां रै दिमाग मांय घर कर लेवै। रामनिवास शर्मा अर श्रीमंत कुमार व्यास इण ढाळै री केई सरस कहाणियां लिखी।  
      कहाणी ‘अनाम रिस्तो’ री नायिका सुधा सुधीर नै कैवै- “एक बात बताओ सुधीरजी, अबार इण घर रो माहौल कित्तो चोखो है। आपां दोनूं सागै भेळै रैवां। लाडो भी अबै थांरै बिना नीं रैय सकै। कोई फेरा खावणा ई तो जरूरी कोनी। प्रेम हुवणो चाईजै। आपां बिना ब्यांव करियां ई लारलै एक साल सूं साथै रैय रैया हां। आपां बिचाळै बै ई रिस्ता बणग्या है, ... जिका ब्यांव करियां पछै हुया करै। सगळी दुनिया इण बात नैं जाणै अर आपां लारै बातां ई करै। फेर ब्यांव करण री जरूरत कांई है?”
      इण बात माथै सुधीर आ जरूर कैवै कै ब्यांव सामाजिक पट्टो हुवै पण सुधा ‘लिव इन रिलेशन’ में रैवणी चावै। राजस्थानी साहित्य में सुधा रो ओ सोच अगाड़ी कैयो जावैला। "अबै माफी नीं" री नायिका ई दुनियां री चिंता छोड़ रैयी है, अर सुधा ई इण चिंता सूं मुगत लखावै। दुनिया री चिंता छोड़’र खुद खातर जीवण मांय बगत मुजब बदळाव जरूरी हुवै। आं लुगायां रो सोच बदळ’र अगाड़ी आवणो सरावणजोग। इणी ढाळै कहाणी ‘ममता’ मांय आपां देखां कै परदेस सूं पढ-लिख’र ई कुंवर साब आपरी जड़ा अर जमीन सूं प्रीत पाळै अर घर री नौकराणी ममता नै ब्यांव सारू दाय करै। संग्रै अगाड़ी मांय ग्यारा कहाणियां है। आं कहाणियां मांय समाज री अबखायां अर नवै सोच नै दरसावती केई कहाणियां मिलै। कहाणियां री मूळ चेतना का केंद्रीय भाव सदा अगाड़ी हुवण अर अगाड़ी रैवण नै मान सकां। जूनी बातां नै छोड़’र बगत मुजब नवी रीत नै परोटणी अर अंगेजणी आं कहाणियां री खासियत मानीजैला।
      करण नै तो सगळी कहाणियां माथै विगतवार खूब बात करी जाय सकै, पण मंच माथै बिराजियां राजस्थानी रा लूंठा साहित्यकार ई आपरी बात राखैला। सेवट एक घणी जरूरी बात संकेत रूप कैवणी चावूं कै राजस्थानी भाषा रै साहित्य नै बांचण मांय आपां आगाड़ी बणा। भाई प्रशांत बिस्सा पोथ्यां माथै डिस्काउंट ई घणो देवै, अर साथै-साथै अबार म्हनै सुणीज रैयो है कै बै मन ई मन कैय रैया है कै जे म्हैं इण मंच माथै पोथी बाबत पूरी विगतवार बात मांड’र कैय दी तो पोथी बांचलै कुण। अबै बगत आयग्यो है कै आपां भासा खातर आ जिम्मेदारी समझ’र अगाड़ी बणा। जोशी नै एकर भळै बधाई। आयोजक संस्था रो आभार कै म्हनै म्हारी बात कैवण रो मौको दियो।
      जय राजस्थान। जय राजस्थानी। 





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2011 2013 Dayanand Sharma INDIAN LITERATURE Neeraj Daiya अकादमी पुरस्कार अतिथि संपादक अनिरुद्ध उमट अनुवाद अनुवाद पुरस्कार अन्नाराम सुदामा अपरंच अब्दुल वहीद 'कमल' अरविन्द सिंह आशिया आईदान सिंह भाटी आकाशवाणी बीकानेर आत्मकथ्य आपणी भाषा आलेख आलोचना आलोचना रै आंगणै उचटी हुई नींद उचटी हुई नींद. नीरज दइया ऊंडै अंधारै कठैई ओम एक्सप्रेस ओम पुरोहित 'कागद' ओळूं री अंवेर कथारंग कन्हैयालाल भाटी कन्हैयालाल भाटी कहाणियां कविता कविता कोश योगदानकर्ता सम्मान 2011 कविता पोस्टर कविता महोत्सव कविता संग्रह कविता-पाठ कविताएं कहाणीकार कहानी काव्य-पाठ कुंदन माली खारा पानी गणतंत्रता दिवस गद्य कविता गवाड़ गोपाल राजगोपाल घोषणा चित्र चेखव की बंदूक छगनलाल व्यास जागती जोत जादू रो पेन डा. नीरज दइया डेली न्यूज डॉ. तैस्सितोरी जयंती डॉ. नीरज दइया तैस्सीतोरी अवार्ड 2015 थार-सप्तक दिल्ली दिवाली दुनिया इन दिनों दुलाराम सहारण दुलाराम सारण दुष्यंत जोशी दूरदर्शन दूरदर्शन जयपुर देशनोक करणी मंदिर दैनिक भास्कर दैनिक हाईलाईन सूरतगढ़ नगर निगम बीकानेर नगर विरासत सम्मान नंद भारद्वाज नमामीशंकर आचार्य नवनीत पाण्डे नवलेखन नागराज शर्मा नानूराम संस्कर्ता निर्मल वर्मा निवेदिता भावसार निशांत नीरज दइया नेगचार नेगचार पत्रिका पठक पीठ पत्र वाचन पत्र-वाचन पत्रकारिता पुरस्कार परख पाछो कुण आसी पाठक पीठ पारस अरोड़ा पुण्यतिथि पुरस्कार पुस्तक समीक्षा पोथी परख फोटो फ्लैप मैटर बंतळ बलाकी शर्मा बातचीत बाल साहित्य बाल साहित्य पुरस्कार बाल साहित्य सम्मेलन बिणजारो बिना हासलपाई बीकानेर अंक बीकानेर उत्सव बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव बुलाकी शर्मा बुलाकीदास "बावरा" भंवरलाल ‘भ्रमर’ भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ भारत स्काउट व गाइड भारतीय कविता प्रसंग भाषण भूमिका मंगत बादल मंडाण मदन गोपाल लढ़ा मदन सैनी मधु आचार्य मधु आचार्य ‘आशावादी’ मनोज कुमार स्वामी माणक माणक : जून मीठेस निरमोही मुक्ति मुक्ति संस्था मुलाकात मोनिका गौड़ मोहन आलोक मौन से बतकही युगपक्ष रजनी छाबड़ा रवि पुरोहित राज हीरामन राजकोट राजस्थली राजस्थान पत्रिका राजस्थान सम्राट राजस्थानी राजस्थानी अकादमी बीकनेर राजस्थानी कविता राजस्थानी कविताएं राजस्थानी कवितावां राजस्थानी भाषा राजस्थानी भाषा का सवाल राजेंद्र जोशी राजेन्द्र जोशी रामपालसिंह राजपुरोहित लघुकथा लघुकथा-पाठ लालित्य ललित लोक विरासत लोकार्पण लोकार्पण समारोह विचार-विमर्श विजय शंकर आचार्य वेद व्यास व्यंग्य शंकरसिंह राजपुरोहित शतदल शिक्षक दिवस प्रकाशन श्रद्धांजलि-सभा संजय पुरोहित समाचार समापन समारोह सम्मान सम्मान-पुरस्कार सम्मान-समारोह सरदार अली पडि़हार सवालों में जिंदगी साक्षात्कार साख अर सीख सांझी विरासत सावण बीकानेर सांवर दइया सांवर दइया जयंति सांवर दइया जयंती साहित्य अकादेमी साहित्य अकादेमी पुरस्कार साहित्य सम्मान सुधीर सक्सेना सूरतगढ़ सृजन साक्षात्कार हम लोग हरीश बी. शर्मा हिंदी अनुवाद हिंदी कविताएं

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श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 31 जुलाई,1992
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