Saturday, May 07, 2016

ऊंडै अंधारै कठैई / डॉ. नीरज दइया

बीकानेर/ 10 मई / हिंदी के प्रख्यात कवि-आलोचक चिंतक डॉ. नन्दकिशोर आचार्य ने कहा कि मातृभाषा राजस्थानी होने के उपरांत भी मेरे सोचने-विचारने की भाषा हिंदी है और अनेक आग्रहों के उपरांत भी मैं राजस्थानी में लिख नहीं सका, ऐसे में कवि-अनुवादक नीरज दइया द्वारा पुस्तक ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ का अनुवाद राजस्थानी पाठकों के लिए उपलब्ध करना सुखद अनुभूति देता है। वे मुक्ति संस्था एवं सूर्य प्रकाशन मंदिर के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित राजस्थानी कविता संग्रह “ऊंडै अंधारै कठैई” के लोकार्पण-समारोह के अवसर स्थानीय महाराजा नरेन्द्र सिंह ऑडिटोरियम में बोल रहे थे। इस अवसर पर डॉ. आचार्य ने ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ कविता संग्रह में अनूदित अपनी कविताओं- पिता के न रहने पर, हर कोई चाहता है, अभिनय क्या आत्महत्या है, मुखौटा तथा लामकां हैं भाषा के मूल पाठ से दर्शकों-श्रोताओं को अभिभूत कर दिया। इस अवसर पर डॉ. आचार्य ने कहा कि मुझे हर्ष है कि राजस्थानी के प्रख्यात लेखक और मेरे प्रिय डॉ. अर्जुन देव चारण के जन्मदिवस पर यह लोकार्पण कार्यक्रम हो रहा है।  
            कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जोधपुर से पधारे प्रख्यात कवि-आलोचक एवं केंद्रीय साहित्य अकादेमी में राजस्थानी परामर्श मंडल के संयोजक डॉ. अर्जुनदेव चारण ने कहा मूल कवि डॉ. नंदकिशोर आचर्य एवं अनुवादक डॉ. नीरज दइया को बधाई देते हुए कहा कि सृजन का उत्स ही गहन अंधकार में कहीं होता है और यह सृष्टि के आदि से देखें तो अनेक स्तरों पर हम पाते हैं कि मनुष्य के मन में छिपे गहन अंधकार को पहचाना और भाषा में पहचान योग्य निर्मित करना ही साहित्य का धेय रहा है। डॉ. चारण ने कहा कि डॉ. नीरज दइया के इस अनुवाद की सफलता है कि इसे पढ़ते हुए हमें मूल कविताओं जैसा निरंतर अहसास होता है। उन्होंने भाषा और अनुवाद के मर्म को समझाते हुए आगे कहा कि अनुवाद को संभवतः अनुसृजन इसीलिए कहा गया कि मूल भाषा से दूसरी भाषा के पाठकों तक उसके परिवेश और नए शब्दों में अनुभव-अनुभूतियों को फिर से आविष्कार करने का यह सृजनात्मक कार्य बेहद कठिन होता है।
            कार्यक्रम के अध्यक्ष लोककला मर्मज्ञ डॉ. श्रीलाल मोहता ने अपने अनेक अनुभवों को साझा करते हुए अनुवाद और मूल के अंतर्संबंधों पर विस्तार से बात करते हुए कोई भी अनुवाद मूल से आगे नहीं हो सकता किंतु अनुवाद को पढ़कर अगर पाठक मूल की तरफ अन्मुख हो तो अनुवाद की श्रेष्ठा कही जाएगी। उन्होंने कहा कि डॉ. नीरज दइया का अनुवाद सृजनात्मक अनुवाद का अनुपम उदाहरण है इसे पढ़ कर हम डॉ. नंदकिशोर आचार्य की काव्य साधना के विभिन्न आयामों से परिचित हो सकते हैं।
            व्यंग्यकार कहानीकार बुलाकी शर्मा ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए नीरज दइया के अनुवाद कार्य को महत्त्वपूर्ण बताते हुए अपने अनुभवों को साझा करते हुए मूल कवि नंदकिशोर आचार्य की सहजता और खुलनेपन के संस्मरण साझा किए वहीं अनुवादक-कवि नीरज दइया की साहित्य के प्रति लगन और निष्ठा के साथ कार्य की क्षमता को अनुकरणीय बताया। कवि-कहानीकार एवं मुक्ति के सचिव राजेन्द्र जोशी ने कार्यक्रम में मूल कवि डॉ. नंदकिशोर आचार्य एवं अनुवादक कवि डॉ. नीरज दइया की इस जुगलबंदी को राजस्थानी साहित्य के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बताया।
            कहानीकार-आलोचक डॉ. मदन सैनी ने अनूदित कविताओं के संग्रह ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ के संदर्भ में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि यह अनुवाद डॉ. आचार्य के आशीर्वाद से ही मूल कविताओं के समक्षक खड़ा होने में सक्षम रहा है। कवि-अनुवाद नीरज दइया ने अनुसृजन के संदर्भ में अपनी भूमिला में स्पष्ट किया है कि अनूदित कविताएं मूल कविताओं का भावाभिनय होती है और उनकी लगन और मेहनत से इस अनुवाद को सफलतम भावाभिनय कहा जा सकता है। डॉ. सैनी ने मूल और अनुवाद के अनेक संदर्भ और उदाहरण देते हुए अनूदित कृति ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ को अनेकानेक भाव-भूमि से सजा जीवंत दस्तावेज बताते हुए कहा कि इससे डॉ. आचार्य की कविता यात्रा के अनेक रंग और पड़ाव देखे जा सकते हैं।  
            कवि-आलोचक डॉ. नीरज दइया ने संग्रह से मूल कवि द्वारा पठित चयनित कविताओं के अनुवाद-पाठ के साथ ही अन्य कविताओं का हृदयस्पर्शी पाठ किया। ठेठ राजस्थानी मुहावरों से सजी कविताओं के इस पूरे पाठ के दौरा कार्यक्रम में बिजली गुल होने से घना अंधेरा रहा और पढ़ी गई कविताएं संग्रह ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ के मूल मर्म को जैसे सार्थक कर रही थीं। 
            इस अवसर पर डॉ. नीरज दइया ने लोकार्पित पुस्तक ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ को व्यंग्यकार-कहानीकार बुलाकी शर्मा, साहित्यकार-संपादक एवं रंगकर्मी मधु आचार्य ‘आशावादी’ एवं कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी को समर्पित साहित्यकारों को मंच पर पुस्तक भेट की। मुक्ति संस्था एवं सूर्य प्रकाशन मंदिर के द्वारा मंचस्त डॉ. नंदकिशोर आचार्य, अर्जुन देव चारण, डॉ. श्रीलाल मोहता, डॉ. मदन सैनी एवं डॉ. नीरज दइया का सम्मान सॉल एवं शाफा पहनाकर किया गया।
            कार्यक्रम में लक्ष्मीनारायण रंगा, माहिर आजाद, सरदार अली पड़िहार, डॉ. अजय जोशी, आनंद वी. आचार्य, अमित-असित गोस्वामी, मुरली मनोहर माथुर, बी डी जोशी, प्रो मोहम्मद हुसैन, हरीश बी. शर्मा, चंद शेखर जोशी, सरल विशारद, जगदीश शर्मा उज्ज्वल, श्रीमती रजनी छाबड़ा, डॉ. नंदलाल वर्मा, मालचंद तिवाड़ी, नवनीत पाण्डे,  कमल रंगा, मोहम्मद फारूख, बी एल नवीन, राजाराम स्वर्णकार, जगदीश सोनी, राकेश कांतिवाल, संदीप परिहार, राजाश्री जांगिड़, के एल माहोलिया, अनिल कुमार व्यास, प्रमोद जांगिड़, खुशाल चंद रंगा, पी आर भाटी, श्रीमती सरोज भाटी, आत्म राम भाटी आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन कवि-कहानीकार राजेन्द्र जोशी ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ. प्रशांत बिस्सा ने किया।
                                                                                                           राजेन्द्र जोशी, सचिव












डॉ. नन्दकिशोर आचार्य री टाळवी कवितावां / ऊंडै अंधारै कठैई
"ऊंडै अंधारै कठैई" (2016) संचै-अनुसिरजण : नीरज दइया
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर- 334003, पाना : 120, कीमत : 200/-
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हिन्दी के यशस्वी कवि-आलोचक एवं नाटककार डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की चुनिंदा कविताओं का कवि-अनुवादक डॉ. नीरज दइया द्वारा किया गया राजस्थानी अनुसृजन ‘ऊंडै अंधारै कठैई’ का लोकार्पण आगामी मंगलवार 10 मई को सांय 5.30 बजे स्थानीय नागरी भंडार स्थित महाराजा नरेन्द्र सिंह ऑडिटोरियम में होगा।
मुक्ति संस्था के सचिव कवि-कहानीकार राजेंद्र जोशी ने बताया कि लोकार्पण कार्यक्रम के अध्यक्ष शिविरा के पूर्व संपादक वरिष्ट कवि भवानी शंकर व्यास ‘विनोद’ तथा मुख्य-अतिथि केंद्रीय साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के राजस्थानी परामर्श मंडल के संयोजक प्रख्यात कवि-आलोचक व नाटककार डॉ. अर्जुनदेव चारण होंगे। जोशी ने बताया कि मुक्ति संस्थान एवं सूर्य प्रकाशन मंदिर के संयुक्त तत्वाधान में होने वाले इस कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष केंद्रीय साहित्य अकादेमी से सम्मानित उपन्यासकार-कवि एवं नाटकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ होंगे।
कार्यक्रम के समन्वयक कहानीकार-व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने बताया कि कवि-आलोचक एवं अनुवादक डॉ. नीरज दइया ने प्रख्यात कवि-आलोचक डॉ. नन्दकिशोर आचार्य के अब तक प्रकाशित 14 विभिन्न कविता संग्रहों से चयनित कविताओं को राजस्थानी में प्रतिनिधि कविता संग्रह के रूप में प्रस्तुत किया है तथा लोकार्पण के अवसर पर मूल कवि डॉ. नन्दकिशोर आचार्य की उपस्थिति में वे चयनित कविताओं का पाठ करेंगे।
प्रकाशक डॉ. प्रशांत बिस्सा ने बताया कि लोकार्पित कविता संग्रह पर प्रसिद्ध कहानीकार-अनुवादक और हाल में केंद्रीय साहित्य अकादेमी के अनुवाद पुरस्कारा से सम्मानित डॉ. मदन सैनी समालोचनात्मक आलोचनात्मक पत्र वाचन करेंगे तथा कार्यक्रम में अनेक साहित्यकारों के अतिरिक्त नगर के गणमान्य सुधि जन उपस्थित रहेंगे। मुक्ति के कवि-कहानीकार राजेंद्र जोशी ने बताया कि राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति के ‘बापजी चतुरसिंहजी अनुवाद पुरस्कार’ से सम्मानित रचनाकार डॉ. नीरज दइया ने अब तक अनेक पुस्तकों का राजस्थानी अनुवाद किया है, जिनमें अमृता प्रीतम की पंजाबी काव्य-कृति कागद अर कैनवास, निर्मल वर्मा के हिंदी कहाणी संग्रह कागला अर काळो पाणी, भोलाभाई पटेल के गुजराती यात्रा-वृत देवां री घाटी के अतिरिक्त भारतीय की 24 भाषाओं के कवियों की कविताओं का संचयन और अनुवाद सबद नाद बेहद चर्चित रहा है। जोशी ने अधिकाधिक उपस्थिति से कार्यक्रम में सफल बनाने का आह्वान किया है।


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श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 30 जुलाई,1992
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