Wednesday, May 17, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ की चार नई किताबें

विधाओं में अनुप्रास का अन्वेषण ० डॉ. नीरज दइया
    सर्वप्रथम तो चार पुस्तकों के लोकार्पण के अवसर पर साहित्यकार-पत्रकार मधु आचार्य ‘आशावादी’ को हार्दिक बधाई कि वे हिंदी और राजस्थानी दो भाषाओं में निरंतर लिख रहे हैं। विविध विधाओं में निरंतर और साथ-साथ लिखना निसंदेह कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे वे अंजाम दे रहे हैं। मैं उनके उपन्यास ‘दलाल’ और कहानी संग्रह ‘चिड़िया मुंडेर पर’ पर अपनी कुछ बातें आपसे साझा करना चाहता हूं। 
    मधु आचार्य ‘आशावादी’ न केवल साहित्य-समाज वरन हर वर्ग के पाठकों को चहेते लेखक हैं इस उक्ति के प्रमाण में हम सद्य प्रकाशित कथा-साहित्य की पुस्तकों का अवलोकन कर सकते हैं, इन पुस्तकों के फ्लैप पर अंकित शशि शर्मा, पं. हरिनारायण व्यास ‘मन्नासा’, आनंद जोशी और लक्ष्मण राघव की पाठकीय टिप्पणियां इसका साक्ष्य है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 में आरंभ हुई उपन्यासकार मधु आचार्य की उपन्यास-यात्रा में ‘गवाड़’ उपन्यास सर्वाधिक चर्चित रहा है। संभवतः इसका एक कारण यह भी है कि इस उपन्यास पर मधु आचार्य को राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति बीकानेर एवं साहित्य अकादेमी नई दिल्ली के पुरस्कार अर्पित किए गए। हम उपन्यासों की बात करें तो आपके अब तक चार राजस्थानी और पांच हिंदी उपन्यासों के अतिरिक्त दो बाल उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। ‘दलाल’ मधु आचार्य का छठा हिंदी उपन्यास है। वर्ष 2014 में कहानीकार मधु आचार्य का पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ। आब तक की कहानी-यात्रा में तीन राजस्थानी और पांच हिंदी कहानी संग्रह के अतिरिक्त एक बाल कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है। यह भी संयोग है कि आज लोकार्पित हिंदी कहानी संग्रह ‘चिड़िया मुंडेर पर’ भी उपन्यास की भांति छठा कहानी संग्रह है।
 
 उपन्यास का शीर्षक ‘दलाल’ स्वयं में अपनी एक कहानी अपने नाम से व्यंजित करता है। जाहिर है कि यह नाम इस बात का खुलासा भी है कि यह उपन्यास दलाल के जीवन पर केंद्रित है। किसी रचनाकार के लिए यह चुनौतीपूर्ण होता है कि वह किसी पूर्वनिर्धारित अर्थ के साथ-साथ अथवा समानांतर ऐसी कुछ व्यंजनाओं का अन्वेषण करे जो उसका विस्तार हो। दलाल में ऐसा ही हुआ है साथ ही यहां उपन्यास में रोचकता, रहस्य, रोमांच, कौतूहल और पाठनीयता का उचित समन्वय भी देखा जा सकता है। मधु आचार्य अपने उपन्यास ‘दलाल’ में हमारी संभावनाओं और आकांक्षाओं से इतर बहुत कुछ नया लेकर हमारे सामने आए हैं।
    किसी भी समय का साहित्य हमारे सत्यों, अर्धसत्यों अथवा आंशिक सत्यों का सत्यापन करता है अथवा कहें कि उसे ऐसा करना चाहिए। यही साहित्य का गुणधर्म भी है। हमारी अविरल सांस्कृतिक-धारा और लोक-विश्वासों के मध्य हमें फिर-फिर ऐसे सत्यों का साक्षात्कार होता है जो हमारे पूर्व परिचित होते हैं। ऐसे में महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह किया जाना जरूरी है कि इस जीवन में नया क्या है? ऐसी शंका के बीच यह भी सत्य है कि प्रत्येक जीवन और प्रत्येक क्षण नया ही होता है। प्रत्येक रचनाकार की अपने समय के नए-पुराने मिश्रित सत्यों से मुठभेड़ होती है, उसमें साहित्य और साहित्यकार हमारी दृष्टि और दृष्टिकोण का अन्वेषण करते हुए हमें एक दिशा देता है। मधु आचार्य ‘आशावादी’ का यह उपन्यास ‘दलाल’ ऐसे ही एक अन्वेषण और दृष्टि की एक यात्रा संभव करता है। मैंने अनेक बार पहले कहा है कि मधु आचार्य के अपने कथा-साहित्य में भाषा और शिल्प को बहुधा नाटकीय ढंग से विकसित करने का कौशल जानते हैं। अपने कथा साहित्य में वे ऐसे अनेक स्थल सायास निकालने में सफल होते हैं, जहां छोटे-छोटे संवादों से कुछ नाटकीय स्थितियों के माध्यम से वे मर्म पर वे चोट कर सकें।
    उपन्यास ‘दलाल’ का आरंभ कथानायक के बचपन से किया गया है और आरंभ में किसी बाल उपन्यास जैसा भ्रम होता है। ‘गोलू का गोलमाल’ पहले उपखंड में गोलू और उसके अंकल की बातचीत जहां हमें सम्मोहित करती है, वहीं आगे चलकर उसके जीवन-इतिहास के पृष्ठों को एक एक कर खोल कर चरित्र पर नया प्रकाश डालती है। जो बालक घर-परिवार के स्नेह से वंचित रहा, जिसको उसके सहज विकास से दौर में जीवन घर से बाहर गलियों में तलाशना पड़ा हो। ऐसे जीवन का सहज अंदाजा हम लगा सकते हैं। यह भारतीय साहित्य और जीवन की रूढ़ त्रासदी है कि सौतेली मां अपनी औलाद होते ही बदल जाती है। गोल ने जीवन में अनेक थपेड़े खाए। बाल मजदूरी से उसकी यात्रा आरंभ हुई जो जेल-जमानत से हो कर अंततः सेठ हरखचंद से मिलने पर कुछ पटरी पर आती है। किंतु यह पटरी सामाजिक दृष्टि में उचित नहीं कही जाती है। गोलू ने दलाल का काम 70 हजार मासिक में करना स्वीकार किया। शहर से 15 किलोमीटर दूर फार्म-हाउस में औरतों को पहुंचाने और छोड़ने का कार्य करते हुए वह मन बहलता- यह दलाल नहीं बस मध्यस्त का कार्य है।
    उपन्यास में गोलू की इस कहानी में उसके कई सपने हैं जो साकार भी होते हैं। उसका घर बनाता है, घरवाली के रूप में शालिनी जैसे लड़की आती है। शालिनी का शिक्षिका के रूप में अपना सुंदर भविष्य देखना जैसे अनेक घटक उपन्यास में समायोजित हुए हैं। पाठकों को इस पूरे घटनाक्रम में गोलू का नेक और पाक चरित्र प्रभावित करता है। वहीं उपन्यास त्वरित गति और नाटकीय ढंग से आगे बढ़ता जाता है। जिस औरत को गोलू फार्म-हाउस पहुंचाता और छोड़ता है उसी की जवान होती बेटी शालिनी सारे घटनाक्रम से अनजान रखी गई है। अनंत वह अपनी मां के निधन के बाद गोलू के साथ शादी के बंधन में बंधती है। उपन्यास का एक अंश उदाहरण के रूप देखें-
गोलू और शालिनी की शादी हो गई। गृह प्रवेश हुआ तो शहर के बड़े-बड़े लोगों को बुलाया गया। बुलाने वाला सेठ था इसलिए हर वर्ग के लोग पहुंचे। गोलू ने अपनी पत्नी के कहने से हॉल में उसकी मां की एक तस्वीर भी लगा रखी थी। बड़े-बड़े अफसर, नेता सेठ उस तस्वीर के सामने रुकते। गौर से देखते और गोलू से सवाल करते।
- यह तस्वीर किसकी है?
- मेरी सास की है।
सभी एक नजर उसके साथ खड़ी शालिनी पर डालते। मुस्कुराते।
- अच्छा।
इससे ज्याद कुछ नहीं कहते और चल देते आगे।
    लोगों का यह ‘अच्छा’ कहना ही, अपने आप में जैसे किसी अनकही कहानी से शालिनी के परिचित होने का मूल घटक है। फिर भी पुत्र अनमोल के सुखद भविष्य में खोया यह जीवन समय के साथ आगे बढ़ता है। उपन्यास सेठ हरखचंद की मृत्यु के बाद जैसे करवट लेता है। दलाल गोलू का बेरोजगार होना और लोगों के ताने सुनना तक सब कुछ गोलू के लिए सहनीय था। किंतु वह शालिनी के विषय में असहनीय कथन सुनकर उत्तेजित हो कर आपा खो देता है और इस झगड़े में जेल जाता है।

    चरित्रों के बारे में संवादों के जरिए उसकी अगली-पिछली कथा कहना मधु आचर्य की एक विशेषता रही है, जो उनके इस उपन्यास में भी यत्र-तत्र-सर्वत्र देखी जा सकती है। पूरा उपन्यास किसी फिल्म भी भांति एक प्रवाह लिए हुए चलता है। मूल संवेदना या मर्म कहें कि जिस लड़की शालिनी के लिए गोलू जीवन पर्यंत दुनिया से लड़ता-जूझता है, वही अंत में उसे बेसहारा छोड़ जाती है। उपन्यास के आरंभ में एक पंक्ति आती है- ‘इतना गंभीर क्यों हो रहा है। छोड़ ना। दुनिया यूं ही चलती रहेगी।’  यकीन करें मधु आचार्य ने इस दुनिया की बहुत-सी गंभीर बातें अपने उपन्यासों के माध्यम से कही है।
००००
    कहानी संग्रह ‘चिड़िया मुंडेर पर’ स्त्री-विमर्श की 9 कहानियां का संकलन हैं। कहानियों का सरोकार हमारे देश की आधी आबादी यानी स्त्रियों के जीवन से जुड़ा हुआ है। ये कहानियों हमारे समय और समाज के ऐसे अनेक चरित्रों से हमारी पहचान कराती है जिनकी अपनी अलग कहानियां हैं। जीवन के विस्तार को व्यंजित करती इन कहानियों में सर्वाधिक रेखांकित होने वाली सच्चाई यह है कि हमारे उत्तर-आधुनिक समय में भी हम लड़के-लड़की का भेदभाव नहीं मिटा सके हैं। शीर्षक कहानी ‘चिड़िया मुंडेर पर’ में बदलते शहरी जीवन और आधुनिकता के संत्रास को व्यक्त किया गया है। जीवन से बाहर होते जा रहे पंछियों की तरफ संकेत करते हुए कहानीकार आधुनिक सभ्यता और संस्कृति के विकास के अवरोधों को प्रकट करता है जहां स्त्री जीवन को परिधियों में सीमित कर दिया गया है।
    कहानी ‘जानकी की जिजीविषा’ में जानकी जैसी लड़की का संघर्ष मुखर हुआ है। यहां यह संघर्ष हमें बल देता है, तो लड़की होने की त्रासदी भोगता स्त्री जीवन द्रवित भी करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम आधुनिक समय और समाज में रहते हुए भी मध्ययुगीन समाज की मानसिकता जीने की त्रासदी झेल रहे हैं। ‘काश! छू लेती आकाश’ कहानी में मधु आचार्य की कथानायिका सुरेखा का जीवन इसी ज्वलंत सच्चाई से हमारा साक्षात्कार कराता हैं। हमारे सामाजिक यथार्थ का सुरेखा तो बस एक प्रतीक है। लड़के-लड़की में समाजिक भेदभाव को व्यंजित करना कहानीकार का एक मात्र उद्देश्य नहीं है, वरन वह उन बेटियों को सपनों का स्मरण कराते हुए बेटों के त्रासद व्यवहार से तुलना भी करने के अवसर उपलब्ध करता है। हमें हमारी विचारधारा पर चिंतन को विवश अथवा प्रेरित करना इन काहनियों का उद्देश्य है। मधु आचार्य के इस संग्रह की कहानियां हमें हमारे संस्कार, शिक्षा-व्यवस्था और आदर्शों के पुनर्मूल्यांन हेतु फिर फिर संकेत करती हैं। कला के विविध रूपों की बानगी इन कहानियों में मिलती है। ‘रंग, कैनवास और जिंदगी’ कहानी में चित्रकार प्रांजल की कला और उसके अवसाद की मार्मिक गाथा है, तो ‘रिश्तों का अनुप्रास’ के माध्यम से गायन के क्षेत्र में कीर्तिमान अर्जित करती वीणा और उसकी मां के माध्यम से संदेश दिया गया है कि जो रिश्ते हमारे नहीं हैं, उन्हें भूल जाना ही हितकर है। इन कहानियों में जीवन में भरपूर जीने का संदेश किसी शिक्षा के रूप में नहीं वरन घटित घटनाक्रम से उद्घाटित होता है।
    जीवन में सब कुछ हमारे हाथों में होते हुए भी हम नियति के आगे लाचार, बेबस और मजबूर होते हैं। ऐसा ही सत्य कहानी ‘दर्द से रिश्ता’ प्रस्तुत करती है। कथानायिका सावत्री के दर्द की लंबी दास्तान को कहानी का रूप दिया गया है। एक ऐसा घर जिस में एक साथ पांच अर्थियां उठी हो, उस की मार्मिक त्रासदी कहानी गहराई से प्रस्तुत करती है। मधु आचार्य की कहानियों की नायिकाएं संघर्षशील हैं। वे अपने जीवन के यथार्थ को स्थिति सापेक्ष अंगीकार करने वाली हैं। कहानी ‘यह आसान नहीं’ और ‘रेत में खिला गुलाब’ में एक पुरुष और दो स्त्रियों के त्रिकोण में बंधी फर्ज की अनोखी मिसाल देखी जा सकती है। एक कहानी में परिवार की प्रतिष्ठा का प्रश्न है तो दूसरी कहानी में परिवार के अत्याधुनिक होने की त्रासदी। संबंधों के त्वरित बनने और बिगड़ने की इन कहानियों में जीवन के आबाद और बरबाद होने के विमर्श है।
    मधु आचार्य ‘आशावादी’ के कथा साहित्य में जीवन की गतिशीलता आकर्षित करती है। वे भाषा में ऐसे चरित्रों और घटनाओं को हमारे सामने बनते और घटित होते हुए चित्रित करते हैं कि बहुत से चरित्र और घटनाएं हमारी स्मृति की स्थाई निधी में संचित हो जाते है। ऐसे बहुत से कारण है किंतु उन कारणों में संभवतय एक कारण यह भी है कि मधु आचार्य का अपना एक पाठक वर्ग तैयार हुआ है। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि उन्होंने अपना एक पाठक वर्ग तैयार किया है। आज जब साहित्य और समाज की बढ़ती दूरियों की बातें होती है उसी समय में साहित्य और समाज की यह अंतरंगता लुभाती है। अंत में एक बार फिर से मधु आचार्य और उनकी पुस्तकों के प्रकाशक डॉ. प्रशांत बिस्सा को बधाई और शुभकामनाएं कि यह जुगलबंदी निरंतर बनी रहे।   
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