Saturday, October 24, 2015

अब ओछी राजनीति छोड़ सृजन को समर्पण की बात करो

अब ओछी राजनीति छोड़ सृजन को समर्पण की बात करो
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रचनाकारों को ओछी राजनीति छोड़ अकादेमी कार्यकारणी समिति में हुए निर्णयों का सम्मान करना चाहिए। किसी कृति पर पुरस्कार सामाजिक स्वीकृति का सामूहिक दस्तावेज होता है। उसकी गरिमा होती है जिसे बनाए रखने की जिम्मेदारी लेखकों की है। जनता के सामने आ गया है कि साहित्य क्या है और उसकी राजनीति क्या है? दो नावों पर सवार होने की बजाय पहली शर्त रचनात्मक साहित्य के प्रति समर्पण रहे तो बेहतर।
- नीरज दइया
(दैनिक भास्कर, बीकानेर / शनिवार 24 अक्टूबर, 2015 / पृष्ठ 16 पर प्रकाशित अभिमत)
यह सराहनीय है कि साहित्य अकादेमी ने बढ़ती असहिष्णुता की निंदा कर रचनाकारों की सामूहिक भावनाओं को अभिव्यक्ति किया है, साथ ही पुरस्कार वापिस ग्रहण की अपील भी अनुकरणीय है। लेखकों को भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ रचनाकारों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। उज्ज्वल पक्ष की कीर्ति और निंदनीय पक्ष का विरोध प्रदर्शन ही साहित्य का उद्देश्य रहा है, इसी की पूर्ति हेतु कलमकारों को जनभावनाओं के अनुरूप सक्रिय लेखन कर समाज के नई दिशा देने की मुहिम तेज करनी चाहिए। आज के दौर में जहां संवेदनाओं का ह्रास हो रहा है तो हमें हमारे पाठकों के भीतर भारतीयता की भावना को प्रेरित-प्रोत्साहित करने की आवश्यकता को समझना चाहिए।
- नीरज दइया
 @ Navjyoti Bikaner

Wednesday, October 21, 2015

शतदल में प्रकाशित कविताओं पर कवयित्री निवेदिता भावसार की टिप्पणी

ये कल्पनाओं का संसार और कवितायेँ। जब से जीवन शुरू हुआ तभी से कल्पनाओं ने भी जन्म लिया। हमने जीवन की शुरुआत ही कल्पना से की। और इन्ही कल्पना के ज़रिये जानना चाहा ज़िन्दगी को , दुनिया को। देखा जाए तो सच का आधार कल्पना ही रहा है।
हमने कल्पना की , और निकल पड़े सच की तलाश में। और जब सच जाना तो ख़ारिज कर दिया कल्पना को। कई दफा यूँ भी हुआ सच जानकर भी हमने उसे नहीं अपनाया। कल्पना का स्वाद हमें सच से ज़्यादा मीठा जो लगा।
आइये आज मिलते हैं ऐसे कवि से जो कहते हैं "नहीं मैं नहीं रीझूंगा सूरज चाँद की गुड़कती गेंदों पर जानना चाहता हूँ मैं "
जी हाँ आज के हमारे शतदल के तिरपनवे कवि हैं श्री नीरज दइया जी। शतदल में शामिल इनकी चारों कवितायेँ "बच्चे हैं पहाड़","जानना चाहता हूँ मैं " , "नींद के भीतर बाहर " और "पन्क्तियों में रविवार " जैसे इनके किसी बच्चे की तरह साफ़ मन का आइना है।
आपकी चारों ही कवितायेँ मुझे बेहद पसंद आई। आज पढ़ते वक़्त यूँ लगा जैसे मेरा हर बात को जानने की उत्सुकता लिए बचपन फिर से जी उठा।
सर , आपकी कविता "बच्चे हैं पहाड़" बेहद ही प्यारी लगी मुझे। सच आपने तो इन खामोश पत्थरों को भी बोलना सिखा दिया। और वो भी कितने प्यार से।
यही तो प्रकृति से सच्चा प्रेम है के फूलों के सूखने भर से हमारी आँखे नम हो जाएँ।
आइये मुस्कुराते हुए पढ़ते हैं ये कोमल सी कविता -"बच्चे हैं पहाड़ "
"पहाड़ पर चढ़ा आदमी चिल्लाता है ज़ोर से
जिसे वह पुकारता है ,पहाड़ भी पुकारते हैं उसे
उसके साथ
पहाड़ चाहते हैं मिल जाए वह उसे, वह चाहता है जिसे

कहता है मेरा मित्र -बच्चे हैं पहाड़
वे अपने आप नहीं बोलते, देखो मैं समझाता हूँ तुम्हे
मैं बोलूंगा -एक पहाड़ भी बोलेंगे -एक
फिर वह हंसने लगा हंसने लगे पहाड़ भी "

आह कितनी खूबसूरत है ये कविता। कितनी प्यारी। सच ऐसा लगा जैसे मैं किसी पहाड़ की ही उंगली थामे खड़ी हूँ और पुकार रही हूँ किसी ऐसे का नाम जो मुझे मिलना नहीं। फिर भी मैं खुश हूँ आती हुई प्रतिध्वनि के साथ। लग रहा है के जैसे कोई तो मेरा साथी है जो चाहता है "मिल जाये उसे वो जिसे वो चाहता है "
सच सर जी बेहद ही प्यारी कविता है।
नीरज सर की एक खास बात और बताऊँ जैसे इन्होने हिंदी भाषा से प्रेम किया उससे कई ज़्यादा प्यार इन्होने अपनी राजस्थानी भाषा को भी दिया। नीरज सर सिर्फ नाम को ही प्रेम नहीं करते , इन्होने राजस्थानी भाषा को के साहित्य को आगे बढ़ाया और अपने खूबसूरत शब्दों से उसे संवारा भी।
कवि का उत्सुक मन कल्पनाओं के संसार से सिर्फ प्रेम करना ही नहीं जानता , बल्कि उसके पीछे के रहस्यों को भी जानने की कोशिश करता है। धरती, आकाश और इस संसार के निर्माण को लेकर जाने कितनी ही लोक कथाएं गढ़ी गयीं। ये जानते हुए भी के सब झुठ है फिर भी हम इन्हे बड़े ही चाव से सुनते हैं। और अंदर ही अंदर सोचते हैं काश के ये सच होता।
लेकिन कवि इन्ही कल्पनाओं इन्ही मिथकों से निकल कर संसार का सच जानना चाहता है। आइये पढ़ते हैं ये कविता -"जानना चाहता हूँ मैं "
"सूरज चाँद की गुड़कती गेंदों पर नहीं रीझूंगा मैं
जानना चाहता हूँ मैं शेषनाग के फन पर टिकी हुई है या
किसी बैल के सींगों पर यह धरती
जानना चाहता हूँ मैं

कि मेरी जड़ें ज़मीन में हैं या आकाश में
किस डोर से बंधा हुआ हूँ मैं
जानना चाहता हूँ मैं

मैं वन वन भटकूंगा या पंख लगा कर उड़ूंगा
आकाश में किसी अन्य की आँख से
जानना चाहता हूँ मैं

किसी बैया राजा की टांगों पर है या
किसी कृष्ण की अंगुली पर यह आकाश
बिरखा बादली या इन्द्रधनुष से नहीं रीझूँगा मैं
जानना चाहता हूँ मैं "

आह सच बेहद ही प्यारी कविता - यूँ लगा जैसे किसी बच्चे ने चाँद के मामा होने का प्रमाण मांग लिया है।
सच जिस दिन हमारी मन की "यह क्या है " जानने की उत्सुकता समाप्त हो जाए समझ लेना चाहिए हमारे अंदर छुपा वह बच्चा मर गया है।
नीरज जी की अगली कविता "नींद के भीतर बाहर" भी एक बेहद मासूम सी कविता है। नींद, जो की खुद ही अपने आप में एक बहुत बड़ा रहस्य है। कहते हैं उस वक़्त भी हमारा मन सबसे ज़्यादा सक्रीय होता है। जैसे किसी अवचेतन अवस्था में हो। जमा रह जाता है नींद में ही कहीं बहुत कुछ भीतर ही भीतर।
"उचटी हुई नींद के बाद जब लगती है आँख
अटकी रहती हो तुम भीतर बहार
जैसे नींद में वैसे ही जागते हुए
नहीं चलता मेरा कोई बस
मैं जान ही नहीं पाया ,कब उचटी नींद कब लगी आँख "

क्या कहूँ ................ सच कई दफा होता है ऐसा। जिसे दिन भर हम भुलाये रहते हैं वो ही ख़याल नींद में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाते हैं। समझ ही नहीं आता के हम जाग रहे हैं या सो रहे हैं।
मैं जान ही नहीं पाया ,कब उचटी नींद कब लगी आँख "
सच कुछ ख्यालों को भूलना बहुत ही मुश्किल होता है। मुए, नींद कड़वी कर जाते हैं आ करके।
जाने क्या क्या बुनते रहते हैं हम , कई दफा मन किसी एक सूक्ष्म बिंदु पर अटक जाता हैं।
और नीरज जी ने अपनी कविता में इसी ठहराव को रविवार का नाम दे दिया है। हैना प्यारी बात। आइये पढ़ते हैं इनकी एक और प्यारी सी कविता -पंक्तियों का रविवार
"लिखते हुए मैं नहीं जानता
कविता की एक पंक्ति
क्या होगी अगली पंक्ति
कुछ भी हो सकता है
आने वाले समय में यह भी हो सकता है कि खाली चला जाए हर वार
कविता में पंक्तियाँ जब चाहे मना लें रविवार "

हाहा सच बेहद ही खूबसूरती और सहजता से आपने उस कठिन समय को भी रच दिया जिस वक़्त कोई ख्याल शब्दों में ढलने को तैयार ही नहीं होता। जाने कितनी दफा पीटा है इन ख्यालों के आगे मैंने अपना सिर।
ख़याल भी तो बच्चों की तरह ही होते हैना।
सर, आज आपको पढ़कर यूँ लगा जैसे मैंने अपना मन पढ़ लिया। मुझे मुझसे मिलाने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया नीरज सर जी ....
ईश्वर करे आपके शब्दों का ये भोलापन सदा यूँही बना रहे। आप यूँही लिखते रहें और खूब तरक्की करें । बस यही कामना है।
एक बार फिर से इतनी खूबसूरत कविताओं के लिए आपका धन्यवाद
आपकी
निवेद
शतदल (संपादक- विजेन्द्र) बोधि प्रकाशन, जयपुर

Tuesday, October 13, 2015

पुरस्कार के लिए चयन ही लेखक करते हैं।

केन्द्रीय साहित्य अकादेमी लेखकों की संस्था है। देश की सरकार का अकादमी के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं है। पुरस्कार के लिए चयन ही लेखक करते हैं। विरोध जताने के तरीके हो सकते हैं। मैं पुरस्कार लौटाने के पक्ष में नहीं हूं। साहित्य अकादेमी इस मुद्दे को लेकर लेखकों के बीच में विवाद का विषय बनती जा रही है। इसमें मुद्दा यह होना चाहिए कि देश में साम्प्रदायिक हिंसा और लेखकों के प्रति आग्रह-दुराग्रह की प्रवृति पर रोक लगे।
पुरस्कार लौटाना लेखकों का अपना नजरिया हो सकता है, लेकिन पुरस्कार देने वाला कोई व्यक्ति अथवा सरकार नहीं है। ऐसे में साहित्य अकादेमी के पुरस्कार लौटाना उचित नहीं है। पुरस्कार लौटाने से कुछ नहीं होगा।

Sunday, October 11, 2015

दैनिक युगपक्ष में कविताओं के अनुवाद एवं शब्द संगत

डॉ. नीरज दइया के साद्य प्रकाशित राजस्थानी कविता-संग्रह “पाछो कुण आसी” की चार कविताओं का हिंदी अनुवाद
कवि परिचय नीरज दइया
जन्म 22 सितम्बर, 1968 राजस्थानी के कवि-आलोचक और अनुवादक। साहित्य अकादेमी, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, नगर विकास न्यास आदि से पुरस्कृत। संपर्क : सी-107, वल्लभ गार्डन, पवनपुरी, बीकानेर- 334003
डॉ. नीरज दइया  की प्रकाशित पुस्तकें
1. भोर सूं आथण तांई (लघुकथा संग्रह) 1989
2.
साख (कविता संग्रह) 1997
3.
देसूंटो (लांबी कविता) 2000
4.
कागद अर कैनवास (अमृता प्रीतम की पंजाबी काव्य-कृति का राजस्थानी अनुवाद) 2000
5.
कागला अर काळो पाणी (निर्मल वर्मा के हिंदी कहाणी संग्रह का राजस्थानी अनुवाद) 2002
6.
ग-गीत (मोहन आलोक के राजस्थानी कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद) 2004
7.
मोहन आलोक री कहाणियां (संचयन : नीरज दइया) 2010
8.
कन्हैयालाल भाटी री कहाणियां (संचयन : नीरज दइया) 2011
9.
आलोचना रै आंगणै (आलोचनात्मक निबंध) 2011
10.
जादू रो पेन (बाल साहित्य) 2012
11.
सबद नाद (भारतीय भाषावां री कवितावां) 2012
12.
मंडाण (राजस्थानी के 55 युवा कवियों की कविताएं) संपादक : नीरज दइया 2012
13.
देवां री घाटी (भोलाभाई पटेल के गुजराती यात्रा-वृत का राजस्थानी अनुवाद) 2013
14.
उचटी हुई नींद (हिंदी कविता संग्रै) 2013
15.
बिना हासलपाई (आलोचना) 2014
16.
पाछो कुण आसी (कविता संग्रह) 2015
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राजस्थानी कविताएं
मूल : नीरज दइया
अनुवाद : नवनीत पाण्डे
 

वापस कौन आएगा....
तुम्हारे छोड़-छिटका देने से
चार दिन बाद में मरते
मर जाएंगे चार दिन पहले...

कहने वालों को कौन टोकता है
बात-बात में मीन-मेख निकालना अच्छी बात नहीं
पूर्व की हवाएं पश्चिम को आए-जाए तो दोष किसका?
आज तक आपके मुताबिक
आपके पसंदीदा गीत गाए
और बस गाते ही रहे हम!

करने को तो बहुत कुछ किया जा सकता है
एक घेरा छोड़ कर घुस सकते हैं दूसरे में
जरूरी नहीं कि सदा हम रहे घेरों में ही
मरने से पहले कहा जा सकता है कोई सत्य!
और क्यूं करे कोई मरने की प्रतीक्षा...
समझ क्यूं नहीं ले सत्य वचन में ही जीवन का है सार।

वह जो तुम्हें- पसंद जो था मैं
अब हो गया है प्रेम उड़न-छू
रह गया है जो कुछ शेष
सब मुरझाया और बेकार-सा
क्या भूला दी है सच में
अच्छे दिनों की सारी स्मृतियां
अगर कहना ही है तो, कुछ घुमा-फिर कर नहीं
साफ-साफ कहिए न!
सच अगर है भीतर कलेजे में कहीं छुपा
कह कर मुक्त क्यों नहीं हो जाएं....

कल रचेगा विश्वास यही सत्य
प्रेम है इस दुनिया से
मगर यहां खण्डित नहीं होगी जरा सी कोर भी
अगर मैं मर ग्या चार दिन पहले...

वापस कौन लौटता है
अगर यही है सच्ची बात
तो कर लेते हैं हिसाब
अब जो बचे हैं दो दिन शेष
इन दो दिनों को कर देते हैं मुक्त
आनंद से जीवन जीने के लिए
पकड़ कर अंगुली चलेंगे कब तक
मेरी तरफ यूं प्रश्नाकुल-व्यथित निगाहों से मत देखो...
जब बदल ही की है निगाहें
तब देखो वह जो मन भाए तुम्हारे
उतरने के बाद मन से
किसलिए ये दिखावटी संबंधों के प्रपंच?
न सही आप, दूसरे तो हैं ही मार्ग में साथ
नमस्कार बोलना तो आता ही है....
रास्ते में मिल ही जाएगा कोई राहगीर साथी

अब जीने दो, दो घड़ी खुलकर हंसने दो
बात-बात में मत अटकाओ टांग
इन्हें संभाल कर रखो यात्रा के लिए
जरा सी हंसी पर मेरी दिखा रहे हो आंखें क्यूं
कहा.. अगर सत्य हो गया भर आएंगीं यही आंखें
अंतत्वोगत्वा पत्थर नहीं हो तुम
हो तो आदमी ही, मेरे अग्रज!

अरे भले आदमियों!
तुम्हारी नफरत और लापरवाही में पलती
सेंधों के साथ मैंने निभाया है अथाह अपनापा
और थोड़ा-सा प्रेम भी छुपाए हूं अपने भीतर अंतस में
तुम अपनी बंदिशों में रहो... अच्छे से!
बहुत भले हो तुम स्वजन!
ना मालूम किस मिट्टी से बने हो
नहीं बोलते जीवन की किसी बात पर
साधे हो मौन मृत्यु के सवाल पर भी!

अच्छा है... चार दिन बाद में मरने से
मर जाएं चार दिन पहले
करते हुए यह प्रार्थना-
रहना अमर तुम! मरना नहीं कभी!
संभाले रखना प्रेम मेरा
...और कुछ नहीं तो
बना देना एक घेरा
प्रेम को केंद्र में रखते उसके इर्द-गिर्द
लोक दिखावे के इसी तुम्हारे प्रेम को लिए
चला जाऊंगा मैं दूर कहीं
मेरे साथ.. मेरे हिस्से जो जितना भी आए
पर क्या यह सुख कम है....
नहीं कोई उलाहना तुम्हें
जो कुछ भी मिला तुम से
कर लूंगा संतोष उसी में
नहीं पूछूंगा तुमसे
धैर्य जीवन का धर्म अपना
क्यूंकि वापस कौन लौटता है...
यह जान लें कि कोई नहीं बचेगा
कौन किसे है छोड़ेनेवाला
छीन लेगी ये दुनिया तमाम हसरतें
हां, सच कहता हूं-
छीन लेगी ये दुनिया सभी कुछ
सभी कुछ... माने सभी कुछ....
और इस छीना- झपटी में स्मृति कहां जाएगी..... ?
००००

मैं कविता की प्रतीक्षा में हूं
ढूंढ़ने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
जब भी करना चाहता हूं संवाद
तो नहीं मिलता कोई ठीक-ठाक प्रश्न
प्रश्न यह है कि कोई कवि क्या पूछे कविता से
क्या किसी कविता से पहचान के बाद भी जरूरी होता है प्रश्न
प्रश्न कि समय क्या हुआ है?
प्रश्न कि बाहर जा रहे हो कब लौटोगे?
प्रश्न कि खाना अभी खाएंगे कि ठहर कर?
प्रश्न कि चाय बना देती हूं पिएंगे क्या?
प्रश्न कि नींद आ रही है लाइट कब ऑफ करोगे?
प्रश्न कि इन किताबों में सारे दिन क्या ढूंढते रहते हो?
प्रश्न कि कोई पैसे-टके का काम क्यूं नहीं करते?
प्रश्न.. प्रश्न... प्रश्न ? शेष है प्रश्न-प्रतिप्रश्न?
किंतु सिर्फ प्रश्नों से क्या बन सकता है?
क्या सभी प्रश्नों को इकठ्ठा कर रच दूं कोई कविता?
पर क्या करुं-
अभी-अभी आया है जो प्रश्न आपके संज्ञान में
इसीलिए तो मैंने सर्वप्रथम लिखा था-
ढूंढने से नहीं मिलती कविता
अयानास ही दीखती है
कविता यह है कि मैं कविता की प्रतीक्षा कर रहा हूं
अगर आपकी भेंट हो
तो कहना उसे कि मैं प्रतीक्षारत हूं।
००००

बीरबल की खीचड़ी है कविता
नमक-मिर्च की पूड़ी नहीं है कविता!
अटपटी लगी आपको यह पंक्ति
किंतु कविता के रचाव को लेकर मैं कुछ कहना चाहता हूं-
जीवन में जरूरी होता है नमक-मिर्च का हिसाब
कवि भी रखता है अपने हिसाब से हिसाब
बिना हिसाब की नहीं होती कविता....

माफी चाहूंगा मैं किसी की पसंद पर
नहीं लिख सकूंगा कोई कविता
बीरबल की खीचड़ी है कविता
गिराता है कोई धास की ढेरी और भड़काता है आग
इधर उस दूर की आग में पकती है कविता.....।
००००

मत मांगना इस मद कोई हिसाब
कहने को तो कह दिया-
देना पड़ेगा हिसाब हर एक शब्द का
पर शब्द खुद हैं मेरे पास बेहिसाब
कैसे किया जा सकता है हिसाब
शब्दों का शब्दों से
जब तुम ने सौंपे थे शब्द मुझे
जब उपजे थे मेरे भीतर शब्द
और जब मिले थे राह पर चलते-चलते  
किताबें पढ़ते और बतियाते शब्द
तब कहां तय था यह-
हिसाब देना होगा हर के शब्द का!

मेरे भाई! कमी नहीं है शब्दों की
शब्द खुद है मेरे पास बेहिसाब
तब क्यूं आंकने बैठ जाऊं मैं हिसाब...
अदल-बदल किया जा सकता है शब्दों को
किसी सीमा में नहीं बंधे हैं शब्द
लिए जा सकते हैं उधार
बिना पूछे, किसी से भी लें किसी के शब्द...
इस निराली दुनिया के शब्दों के महासागर में पहुंचने पर
देखता हूं मैं-
वे बेहिसाब लड़ाते हैं मुझे और मैं उन्हें
होती है- कविता
शब्दों की शब्दों से अनोखी मुलाकात
है यह आपसदारी की बात
जिसे लिख दिया है यहां, स्मरण रहे!
००००

- डा. नीरज दइया की राजस्थानी कविताओं का हिंदी अनुवाद : नवनीत पाण्डे

अनुवादक परिचय
नवनीत पाण्डे : जन्म  26 दिसम्बर, 1962 हिंदी और राजस्थानी में समान रूप से लेखन। हिंदी और राजस्थानी में परस्पर अनुवाद। हिंदी में कविता संग्रह- सच के आस पास’, ‘छूटे हुए संदर्भप्रकाशित। राजस्थानी कहानी संग्रह हेत रा रंगचर्चित। 
संपर्क : 2 डी- 2, पटेल नगर, बीकानेर- 334003 
 
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 भाई नदीम अहदम के लिए आभार शब्द छोटा लग रहा है।
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लेबल

2011 2013 Dayanand Sharma INDIAN LITERATURE Neeraj Daiya अकादमी पुरस्कार अतिथि संपादक अनिरुद्ध उमट अनुवाद अनुवाद पुरस्कार अन्नाराम सुदामा अपरंच अब्दुल वहीद 'कमल' अरविन्द सिंह आशिया आईदान सिंह भाटी आकाशवाणी बीकानेर आत्मकथ्य आपणी भाषा आलेख आलोचना आलोचना रै आंगणै उचटी हुई नींद उचटी हुई नींद. नीरज दइया ऊंडै अंधारै कठैई ओम एक्सप्रेस ओम पुरोहित 'कागद' ओळूं री अंवेर कथारंग कन्हैयालाल भाटी कन्हैयालाल भाटी कहाणियां कविता कविता कोश योगदानकर्ता सम्मान 2011 कविता पोस्टर कविता महोत्सव कविता संग्रह कविता-पाठ कविताएं कहाणीकार कहानी काव्य-पाठ कुंदन माली खारा पानी गणतंत्रता दिवस गद्य कविता गवाड़ गोपाल राजगोपाल घोषणा चित्र चेखव की बंदूक छगनलाल व्यास जागती जोत जादू रो पेन डा. नीरज दइया डेली न्यूज डॉ. तैस्सितोरी जयंती डॉ. नीरज दइया तैस्सीतोरी अवार्ड 2015 थार-सप्तक दिल्ली दिवाली दुनिया इन दिनों दुलाराम सहारण दुलाराम सारण दुष्यंत जोशी दूरदर्शन दूरदर्शन जयपुर देशनोक करणी मंदिर दैनिक भास्कर दैनिक हाईलाईन सूरतगढ़ नगर निगम बीकानेर नगर विरासत सम्मान नंद भारद्वाज नमामीशंकर आचार्य नवनीत पाण्डे नवलेखन नागराज शर्मा नानूराम संस्कर्ता निर्मल वर्मा निवेदिता भावसार निशांत नीरज दइया नेगचार नेगचार पत्रिका पठक पीठ पत्र वाचन पत्र-वाचन पत्रकारिता पुरस्कार परख पाछो कुण आसी पाठक पीठ पारस अरोड़ा पुण्यतिथि पुरस्कार पुस्तक समीक्षा पोथी परख फोटो फ्लैप मैटर बंतळ बलाकी शर्मा बातचीत बाल साहित्य बाल साहित्य पुरस्कार बाल साहित्य सम्मेलन बिणजारो बिना हासलपाई बीकानेर अंक बीकानेर उत्सव बीकानेर कला एवं साहित्य उत्सव बुलाकी शर्मा बुलाकीदास "बावरा" भंवरलाल ‘भ्रमर’ भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ भारत स्काउट व गाइड भारतीय कविता प्रसंग भाषण भूमिका मंगत बादल मंडाण मदन गोपाल लढ़ा मदन सैनी मधु आचार्य मधु आचार्य ‘आशावादी’ मनोज कुमार स्वामी माणक माणक : जून मीठेस निरमोही मुक्ति मुक्ति संस्था मुलाकात मोनिका गौड़ मोहन आलोक मौन से बतकही युगपक्ष रजनी छाबड़ा रवि पुरोहित राज हीरामन राजकोट राजस्थली राजस्थान पत्रिका राजस्थान सम्राट राजस्थानी राजस्थानी अकादमी बीकनेर राजस्थानी कविता राजस्थानी कविताएं राजस्थानी कवितावां राजस्थानी भाषा राजस्थानी भाषा का सवाल राजेंद्र जोशी राजेन्द्र जोशी रामपालसिंह राजपुरोहित लघुकथा लघुकथा-पाठ लालित्य ललित लोक विरासत लोकार्पण लोकार्पण समारोह विचार-विमर्श विजय शंकर आचार्य वेद व्यास व्यंग्य शंकरसिंह राजपुरोहित शतदल शिक्षक दिवस प्रकाशन श्रद्धांजलि-सभा संजय पुरोहित समाचार समापन समारोह सम्मान सम्मान-पुरस्कार सम्मान-समारोह सरदार अली पडि़हार सवालों में जिंदगी साक्षात्कार साख अर सीख सांझी विरासत सावण बीकानेर सांवर दइया सांवर दइया जयंति सांवर दइया जयंती साहित्य अकादेमी साहित्य अकादेमी पुरस्कार साहित्य सम्मान सुधीर सक्सेना सूरतगढ़ सृजन साक्षात्कार हम लोग हरीश बी. शर्मा हिंदी अनुवाद हिंदी कविताएं

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"

स्मृति में यह संचयन "नेगचार"
श्री सांवर दइया; 10 अक्टूबर,1948 - 31 जुलाई,1992
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कविता रो क

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आंगळी-सीध

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